वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?
डॉ राकेश कुमार आर्य
अध्याय : १
क्या होती है राष्ट्र वन्दना ?
भारत की वैदिक संस्कृति परकल्याण की संस्कृति है। कृतज्ञता की संस्कृति है। देवों की संस्कृति है। हमें जो कोई कुछ कहीं से देता है, हम उसके प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हैं और जीवन भर रखते हैं। इसी से हमारे यहां पर कथित रूप से बहुदेवतावाद का विस्तार और विकास हुआ। जिसने भी हमको कुछ दिया, हमने उसी के प्रति श्रद्धा का भाव हृदय में बसा लिया। यह है- भारत। यह है - भारतीयता। यही है- भारतीय संस्कृति की जीवंतता । यही है सनातन का सत्यस्वरूप।
हमने अपनी मातृभूमि के प्रति भी श्रद्धा का भाव रखा। उस पर मर मिटने का भाव रखा। बलिदान देने का भाव रखा। क्योंकि हमारी मातृभूमि हमको जीवन देती है। जीने के सारे साधन देती है। उन साधनों से ही हमारी साधना पूर्ण होती है और उन साधनों के बल पर ही हमें मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस प्रकार मातृभूमि हमारे धर्म की साधना में हमारा साथ देती है । जिससे हमारा इहलोक और परलोक दोनों सधते हैं। इसका लौकिक स्वरूप हमारे अभ्युदय की प्राप्ति में सहायक होता है। हमारी साधना की ऊंचाई हमको निश्नेयस की सिद्धि की ओर ले जाती है।
अथर्ववेद ने हमको बताया कि राष्ट्र एक माता है। यह माता हमारा निर्माण करती है। हमारे जीवन को ऊंचाई देती है। जीवन की साधना को सफल करती है। इसलिए इसके प्रति कृतज्ञ रहो। झुके रहो इसके समक्ष। राष्ट्र ने तुमको तुम्हारी उन्नति का जो सुंदर से सुंदर परिवेश बना कर दिया है, वह परिवेश अक्षुण्ण रहे और उसमें कोई शत्रु आकर सेंध न लगाए। कोई उसकी श्रृंखला को तोड़ने में सफल न हो पाए। इसके लिए सदा सावधान रहो । राष्ट्र को उसके शत्रुओं से बचाने के लिए यदि आपको अपना बलिदान भी देना पड़े तो निसंकोच दे दो। गुरु गोविंद सिंह जी और बंदा बैरागी जैसे वीर योद्धाओं के बलिदानों को हमें इसी रूप में देखना चाहिए। इस प्रकार के बलिदान राष्ट्र की रक्षा के लिए तो आवश्यक हैं ही राष्ट्रवासियों के लिए भी आवश्यक हैं। ऐसे बलिदानों से ही राष्ट्रवासियों के लिए वह सुंदर परिवेश बनाए रखने में हमको सहायता मिलती है, जिसके कारण उनको सब प्रकार की उन्नति के अवसर उपलब्ध होते हैं। सबके कल्याण के लिए अर्थात सब प्रत्येक प्रकार की उन्नति को प्राप्त हो सकें , इसके लिए यदि मेरा बलिदान भी होता है तो मैं कर दूं। यह भाव हमारी वैदिक संस्कृति का है। इसी को परकल्याण कहते हैं। इसी को जीवन की ऊंचाई कहते हैं। अथर्ववेद का कहना है कि :-
"माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु॥”
भावार्थ है कि यह भूमि (पृथ्वी) हमारी माता है और हम सब इसके पुत्र हैं। अपनी मातृभूमि अर्थात् राष्ट्रभूमि के प्रति हम सदा श्रद्धा से भरे रहें। इसके नदी, नाले , पर्वत इसकी हवाएं, इसके सूर्य का प्रकाश ये सब हमारे कल्याण के लिए हैं। इस पर उगने वाली फसलें, वनस्पतियां, पेड़-पौधे आदि हमारे जीवन निर्माण के लिए हैं। इसकी नदियों, झीलों और इसके गर्भ में मिलने वाला जीवन मीठा जल हमारे लिए जीवनप्रद है। इस प्रकार यह मातृभूमि हमारे लिए चौबीसों घंटे जीवन देने वाली है। हमारे लिए ही सांस ले रही है। मानो हमारे लिए ही जी रही है। मानो हमारे लिए ही संघर्ष कर रही है। इसका एक-एक पल हमारे लिए है। ‘पर्जन्य’ अर्थात मेघ हमारे पिता हैं। जैसे पिता अपने प्रेम की वर्षा कर हमारे जीवन का निर्माण करता है, उसकी रक्षा करता है। उसको पुष्पित और पल्लवित होने का अवसर प्रदान करता है, उसी प्रकार पर्जन्य भी हमारे लिए काम करते हैं। यह मातृभूमि और पर्जन्य दोनों मिल कर हमारा ‘पिपर्तु’ अर्थात पालन करते हैं।
इनके अस्तित्व के बिना हमारा अस्तित्व नहीं। ये हैं तो हम भी हैं और ये नहीं है तो हम भी नहीं हैं । यह अथर्ववेद के १२वें कांड, सूक्त १ की १२वीं ऋचा है।
वेद का ऋषि आगे कहता है– “यस्यां वेदिं परिगृह्णन्ति भूम्यां यस्यां यज्ञं तन्वते विश्वकर्माणः।” – अथर्ववेद ( १२.१.१३)
अर्थात इस भूमि पर हम ‘विश्वकर्माण’ अर्थात सृजनशील मनुष्य यज्ञवेदियों का निर्माण करके यज्ञों का विस्तार करने वाले बनें। यज्ञों का विस्तार करना पर कल्याण की भावना को अपने आंतरिक जगत में स्थान देना होता है। हमारी सृजनशीलता इसमें है कि हम अपनी मातृभूमि और पर्जन्य दोनों से यह शिक्षा लें कि हम दूसरों के लिए जिएंगे। दूसरों के लिए मरेंगे। अपने लिए तो पशु मरते हैं। अपने लिए ही वे जीते भी हैं। परन्तु हम तो मनुष्य हैं, हमें तो दूसरों के लिए जीना है। वैदिक संस्कृति की रक्षा के लिए जीना है। उसके विस्तार के लिए जीना है। जैसे मातृभूमि और पर्जन्य दोनों परकल्याण के लिए जी रहे हैं, हमको भी अपने इन माता-पिता के संस्कार अपने लिए प्राप्त करने हैं। मां से कहेंगे कि तेरे दूध को हम लजाएंगे नहीं और पिता से कहेंगे कि तेरे दिए संस्कारों को हम छोड़ेंगे नहीं। तब वैदिक संस्कृति का रक्षण होगा। संरक्षण होगा।
हम सभी जानते हैं कि राष्ट्र एक अमूर्त भावना है। यह दिखाई नहीं देती। फिर भी हम सबसे अपेक्षा की जाती है कि हम राष्ट्र की सेवा करें। तब प्रश्न आता है कि जो दिखाई नहीं देता, उसकी सेवा कैसे की जाएगी ?
यह जो राष्ट्र नाम की अमूर्त भावना है, यह विद्वानों, सैनिकों, किसानों , मजदूरों, स्त्रियों,पशुओं आदि के घटकों से बनती है। मेरे देश के विद्वान सुरक्षित रहें,उनका चिंतन निरंतर राष्ट्र की उन्नति के लिए काम करता रहे, उन्हें ऐसा परिवेश उपलब्ध कराया जाए, ऐसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं कि वे संसार के कल्याण के लिए निरंतर बिना किसी बाधा और बिना किसी विघ्न के काम करते रहें, यह राष्ट्र की सेवा है। मेरा देश मेरे राष्ट्र के वीर सैनिकों से सुरक्षित रहता है। उनके लिए वे सारी सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए जो उनके और उनके जीवन के लिए आवश्यक हैं। वे मेरे राष्ट्र के लिए अपने प्राणों को हथेली पर लिए घूमते हैं। इसलिए उनके परिजनों के प्रति हम सम्मान का भाव रखें , उनका किसी प्रकार से उत्पीड़न न करें। राष्ट्र पर बलिदान देने वाले अपने सैनिक योद्धाओं के प्रति सदैव कृतज्ञ बने रहें, यह भी राष्ट्र की सेवा है।
मेरा राष्ट्र मेरे किसानों की समृद्धि से बनता है। उनके लिए प्रत्येक प्रकार के साधन संसाधन उपलब्ध रहें, जिससे वे आधुनिक ढंग से खेती कर अधिक से अधिक निरोग फसल उगाने में सफल हों और अन्न आदि की आपूर्ति कर समग्र राष्ट्र में उन्नति के सभी साधन उपलब्ध कराते रहें, उनकी फसल का उचित मूल्य प्राप्त हो और वे राष्ट्र में किसी भी प्रकार से पिछड़ने ना पाएं, इस प्रकार का परिश्रम और पुरुषार्थ करना राष्ट्र की सेवा है। राष्ट्र की वंदना है। हमारे देश के मजदूरों के चेहरों पर भी मुस्कान रहे, उनका उचित पारिश्रमिक कभी किसी के द्वारा रोका न जाए, उनकी मजदूरी को उनका अधिकार मानकर उनके प्रति सहज, सरल और विनम्र बने रहना और उन्हें भी मुस्कुराने और प्रसन्न रहने के सभी अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास करना भी राष्ट्र की सेवा है। उनके परिश्रम का सम्मान करना मानो उनका सम्मान करना नहीं है,यह राष्ट्र की सेवा है- ऐसा मानना चाहिए।
देश की नारी शक्ति के प्रति सम्मान का भाव रखना उनके मातृत्व और उनके स्त्री सुलभ गुणों का सम्मान करना, उनके लिए सुरक्षित वातावरण सृजित करना, वेद की आज्ञा के अनुसार उन्हें शिक्षा का अधिकार देते हुए अपना सर्वांगीण विकास करने में सहायक होना भी राष्ट्र की सेवा है। उनके अधिकारों का हनन करना या उन्हें शिक्षा से वंचित करना- राष्ट्र को अपंग करना है। सुसंस्कृत संतान के निर्माण में उनकी भूमिका और उनके योगदान को ससम्मान स्वीकार करना स्वयं अपने जीवन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करना भी राष्ट्र की सेवा है।
पशु आदि भी हमारे लिए उपयोगी होते हैं। परमपिता परमेश्वर ने कोई भी पशु, पक्षी, वनस्पति ऐसी नहीं बनायी जिसकी कोई उपयोगिता न हो। मनुष्य इन सब में सर्वोपरि है तो उसका अर्थ यह नहीं हो जाता कि वह इन सब के ऊपर निरंकुशता से शासन करने का अधिकार रखता है, वह उनके जीवन को भंग नहीं कर सकता, कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर मनुष्य इन पशु, पक्षियों आदि के जीवन के जीने के अधिकार को छीन नहीं सकता। वह इन पर राजा की भांति प्रेम भरी वर्षा करेगा। राजा का कार्य प्रजा संरक्षण होता है। इसलिए बौद्धिक रूप से इन सब में अधिक सक्षम और समर्थ होने के कारण मनुष्य इन सब का संरक्षक है। अतः पशु, पक्षी ,वनस्पति आदि का भी संरक्षण करना, जीने के लिए उन्हें उचित परिवेश उपलब्ध कराना, यह भी राष्ट्र की सेवा है। पशु भी जीवित रहने चाहिए। पक्षी भी जीवित रहने चाहिए। वनस्पतियों का भी अस्तित्व रहना चाहिए। ऐसा भाव बनाए रखना राष्ट्र की सेवा है। आज जो लोग पशु पक्षियों को मारकर खा रहे हैं वे राष्ट्र के शत्रु माने जाने चाहिए। इसी प्रकार कीटनाशकों के नाम पर कीड़े मकोड़ों का विनाश करना या अनेक प्रकार की वनस्पतियों को विनष्ट करना भी राष्ट्र के साथ द्रोह करना है।
राष्ट्र का एक घटक भूमि भी होता है। बिना भूमि के किसी राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। अतः अपनी मातृभूमि के प्रति पूर्ण समर्पण रखना उसे देवी के रूप में सम्मान देना, माता के रूप में उसके प्रति श्रद्धा भाव रखना, प्रत्येक नागरिक का ( अपने देशवासियों को हम 'आर्य' कहते हैं इसलिए प्रत्येक आर्य का ) परम कर्तव्य है। इसीलिए वेद ने भूमि को माता कहा है और राष्ट्रवासियों को उसका पुत्र कहा है। वेद का कितना सुंदर चिंतन है ? कितना उत्कृष्ट चिंतन है ? राष्ट्र भूमि, मातृभूमि और उसके निवासियों का कितनी सुंदर उपमा से वर्णन किया गया है। जैसे परिवार में एक ही माता की अनेक संतानें एक दूसरे का ध्यान रखती हैं, वैसे ही हम राष्ट्रवासी होकर एक ही माता के पुत्र होकर एक दूसरे का सम्मान करें। एक दूसरे का ध्यान रखें- यह राष्ट्र सेवा है।
वेद का चिंतन आज भी सारे भूमंडल के देशों के लोगों का मार्गदर्शन कर रहा है। यही कारण है कि संसार के अधिकांश देश ऐसे हैं जो मातृभूमि के प्रति समर्पण का भाव रखते हैं। उसकी प्रतिमा बनाकर, उसे ' मादरे वतन' या मदरलैंड या मातृभूमि कहकर उसका सम्मान करते हैं। नास्तिक से नास्तिक देश भी अपनी मातृभूमि के प्रति इसी प्रकार की श्रद्धा का भाव रखता है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि संसार में वैदिक संस्कृति के संस्कार आज भी कहीं न कहीं लोगों को हृदय से प्रभावित कर रहे हैं। उन्हें चाहे किसी ने अलग-अलग समय पर आकर किसी भी प्रकार की शिक्षा क्यों न दी हो, उनके धर्म गुरुओं ने या उनके संप्रदाय के प्रवर्तकों ने उन्हें चाहे जिस प्रकार से भ्रमित करने का प्रयास किया हो, परंतु वे आज भी वैदिक चिंतन को ही जीवन का आधार मानते हैं। क्योंकि उस चिंतन में उनको आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।
इस प्रकार राष्ट्र सेवा का अभिप्राय है राष्ट्र के प्रत्येक घटक को सींचना। उसके योगदान को स्वीकार करना। उसके योगदान को राष्ट्राभिव्यक्ति प्रदान करना। जिस प्रकार एक ही गाड़ी में विभिन्न पुर्जे होते हैं और उन सबके सहयोग से ही इंजन गाड़ी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में सफल होता है, उसी प्रकार राष्ट्र का प्रत्येक घटक राष्ट्ररूपी गाड़ी के इंजन का पुर्जा है। इसलिए राष्ट्र के निर्माण में अथवा राष्ट्र को गतिशील बनाए रखने में किसी का भी योगदान कम नहीं हो सकता। सभी का समान योगदान है। इस प्रकार सभी के योगदान को स्वीकार करना और उसे सम्मान देना राष्ट्र की सेवा है। इसीलिए वेद ने और हमारे ऋषियों ने वर्ण व्यवस्था दी। उसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की कल्पना की। वह कल्पना भी मात्र कल्पना नहीं है। वेद ने उसे ' समाज' का नाम देकर सबको सामूहिक अभिव्यक्ति दी। समाज को वर्ण के आधार पर विभक्त नहीं किया जा सकता। आप यह नहीं कह सकते कि यह व्यक्ति ब्राह्मण समाज से है, यह क्षत्रिय समाज से है,यह वैश्य समाज से है और यह शुद्र समाज से है।समाज सभी का सामूहिक संबोधन है। जिस प्रकार राष्ट्र का विखंडन नहीं हो सकता, उसी प्रकार समाज का भी विखंडन नहीं हो सकता।
समाज को तोड़ना राष्ट्र को विकलांग करना होता है। समाज की विसंगतियों का ,विषमताओं का और समाज की कुरीतियों का राष्ट्र पर प्रभाव पड़ता है । उसके मनोबल पर प्रभाव पड़ता है, उसका आत्मबल क्षीण होता है। इसलिए समाज की सेवा भी वही मानी जाती है जिससे समाज की विसंगतियों ,विषमताओं और कुरीतियों का निवारण होता हो। यदि कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार की विसंगति, विषमता अथवा कुरीति का कहीं समर्थन करता है या उसे फैलाने का या बढ़ाने का काम करता है तो वह राष्ट्र को कमजोर करता है। यदि कोई व्यक्ति किसी जाति विशेष को समाज कहकर उसके नाम पर नेतागिरी करता है और इस नेतागिरी को ही समाज की सेवा कहता है तो वह राष्ट्र का शत्रु होता है।
राष्ट्र को जातियों में नहीं तोड़ा जा सकता। राष्ट्र को भाषा में भी नहीं तोड़ा जा सकता। राष्ट्र को क्षेत्रवाद में भी नहीं देखा जा सकता। राष्ट्र को किसी भी प्रकार की संकीर्णता में लाकर खड़ा करना उसके साथ अपघात करना होता है। जब इस प्रकार की संकीर्णताओं में राष्ट्र को खड़ा करने का प्रयास किया जाने लगता है, तब राष्ट्र का विखंडन निश्चित हो जाता है। इसलिए विवेकशील लोग सामाजिक संकीर्णता को मिटाने के लिए संघर्ष करते हैं। क्योंकि सामाजिक संकीर्णता राष्ट्र को दुर्बल करती है। जब इनका अस्तित्व मिट जाता है तो राष्ट्र सबल, सक्षम और समर्थ होता है।
स्वामी दयानंद जी महाराज ने श्रेष्ठ लोगों की संगति को समाज कहा। उनके साथ मिलकर काम करने को राष्ट्र की सेवा कहा। यही कारण है कि आर्य समाज किसी भी प्रकार की संकीर्णता का समर्थन नहीं करता। जो समाज का नहीं हो सकता वह राष्ट्र का भी नहीं हो सकता। जो व्यक्ति समाज में रहकर तोड़फोड़ करता है, वहां पर विखंडन के बीज बोता है, वह राष्ट्र का भी कभी कल्याण नहीं कर सकता। कई बार ऐसे विखंडन से वह जनप्रतिनिधि बन सकता है,किसी पार्टी का नेता बन सकता है। परंतु जनप्रतिनिधि बन जाना अथवा किसी पार्टी का नेता बन जाना राष्ट्र सेवी बन जाना नहीं होता। जो व्यक्ति जनप्रतिनिधि बनकर या किसी पार्टी का नेता बनकर अपने आपको राष्ट्र सेवी घोषित करता है, वह लोगों की आंखों में धूल तो झोंक सकता है, परंतु कभी राष्ट्र का भला नहीं कर सकता। इस प्रकार संप्रदाय ,जाति, क्षेत्र, भाषा आदि की राजनीति करना और उनके आधार पर अपने आप को कहीं से जनप्रतिनिधि बना लेना राष्ट्र सेवा का प्रमाण पत्र नहीं होता।
'वंदेमातरम' हमारी इसी राष्ट्र सेवा की अभिव्यक्ति है। जो लोग आज वंदेमातरम का विरोध कर रहे हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि राष्ट्र सेवा ही राष्ट्र वंदना है। अपनी मातृभूमि के प्रति कृतज्ञ होना ही राष्ट्र वंदना है। वंदेमातरम है। मनुष्य का धर्म है कि वह अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित हो। राष्ट्र के प्रत्येक पुर्जे अर्थात घटक के प्रति सम्मान का भाव रखे। दूसरे का माल मेरा, दूसरे की बहन बेटियां मेरे लिए उपभोग की वस्तु - यह सोच राष्ट्र की प्रगति में बाधक है । आतंकवाद, तोड़फोड़, खूनखराबा, हिंसा यह सब भी राष्ट्र की दुर्गति के प्रतीक हैं। ऐसे लोगों को वंदेमातरम का विरोध करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता जो राष्ट्र की दुर्गति को आमंत्रित करने के कार्यों में लगे हैं। अतः सरकार को चाहिए कि वंदे मातरम के विरोधी को राष्ट्रद्रोही घोषित किया जाए।
अगले अंक में पढ़े स्वराज्य , विश्व कल्याण और वंदेमातरम |
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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