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"माघ-महिमा"

"माघ-महिमा"

रजनीकांत
खिल गई धूप जुड़ाया है जन-मन
जाड़ा पाला न जाने कहां है?
वृद्ध जनों का दूर हुआ दुःख
सूरज देव की धाक यहां है।
खुश हो पखेरू स्वर में गाएं
नील गगन की थाह में उड़ते,
जंगल में चहुंओर है मंगल
जीव जगत और मानव जुड़ते।
चलने लगी है बसंती हवा अब
झूम रहे तरु वृंद ये सारे,
खेतों में गेहूं की बाली है आई
प्रकृति के अब वारे हैं न्यारे।
सुख दुःख दोनों हैं जीवन के संग
मस्त मगन मन सोच न करता,
जो इस जग में दुःख पाले हैं
उनके मन का चिंतन हरता।
है सबका प्रिय माघ महीना
स्वागत हम सब करते रहे हैं,
जो जन शीत के मारे हुए हैं
सुख उनके मन भरते रहे हैं।
रजनीकांत।
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