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यादों हो...

यादों हो...

संजय जैन
हमारी यादों में अब वो
जरा कम ही आते है।
पर जब वो याद आते है
तो दिलको दुखा जाते है।
पहले तो रोज आते थे
और दिलको वो संभालते थे।
पर अब न जाने उनको
किस की नजर लग गई है।।


जो पहले रोज आते थे
अब वो कम ही आते है।
और अपनी आँखो से भी
वो क्यों नजर चुराते है।
उनकी इस नाराजगी का
हम कुछ भी पता नही है।
मुझे इसका कारण अब
उनसे मिलकर जानना है।।


मोहब्बत में प्रेम तकरार
दोनों ही चलते रहते है।
परंतु जीत सदा ही
मोहब्बत की ही होती है।
इसलिए तो मोहब्बत की
सभी खाते है कसमे जो।
और अपना दिल भी वो
मेहबूब पर लुटाते रहते है।।


भले ही मोहब्बत हमारी
न चड़े पाए परवान ।
परंतु दोस्ती हमारी तो
जिंदा रहेगी मरने तक।
भले ही जलने वाले इसको
कोई भी नाम क्यों न दे।
पर दिलमें ये मोहब्बत
सदा ही अमर रहेगी।।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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