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प्रेम और हवस

प्रेम और हवस

जय प्रकाश कुवंर
वैसे तो बहुत मिलते हैं,
दिल के रास्ते में आने वाले।
पर, बिरले ही मिलते हैं,
दिल से प्रेम निभाने वाले।।
रूप और जवानी क्या देखा,
खींचे चले आते हैं।
शरीर ढलने पर, रूप उजड़ने पर,
बिरले ही कुछ लोग,
प्यार का रिश्ता निभाते हैं।।
जो रूप के जाल में फंस गया,
वो हवस के दलदल में धंस गया।
रूप मायारूपी ठगिनी है,
प्रेम सबसे शुद्ध दिल की अग्नि है।
ये हवस के भुखे लोग,
नारी जीवन को कलंकित करते हैं।
ओछी हरकतों का प्रदर्शन कर,
प्रेमी होने का स्वांग भरते हैं।।
प्रेम और हवस में,
कोई मेल नहीं है।
दिल से आजीवन प्रेम निभाना,
बच्चों का कोई खेल नहीं है।।
जय प्रकाश कुवंर
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