"परकता की छाया"
पंकज शर्माचेहरे—
वे समय के साथ
अपना अर्थ बदल लेते हैं,
भीड़ की आदत में,
दृष्टि की थकान में।
चेहरों का पराया होना
एक दृश्य-भर की घटना है।
परकता—
वह दृश्य नहीं होती,
वह स्पर्श है
जो बिना छुए
मन की त्वचा उधेड़ देता है।
वहाँ कोई मुखौटा नहीं,
वहाँ व्यवहार का नंगा सत्य है।
परकता आते ही
भाषा अपना ताप खो देती है—
शब्द औपचारिक हो जाते हैं,
मौन में दूरी भर जाती है।
जो कभी स्वीकृति था
अब केवल शिष्टाचार रह जाता है।
यह परकता
किसी दूरी की उपज नहीं,
यह निकटता के भीतर
धीरे-धीरे जमती है।
जहाँ अपेक्षा थी,
वहीं सबसे पहले दरार पड़ती है।
मन प्रश्न करता है—
क्या संबंध चेहरों से बनते हैं?
या उस सूक्ष्म ताप से
जो व्यवहार में प्रवाहित होता है?
चेहरे बदल सकते हैं,
पर परकता आते ही
संबंध अपना नाम खो देता है।
इसलिए पीड़ा
अपरिचय से नहीं,
परिचय के ढह जाने से होती है।
जब जाना-पहचाना व्यवहार
अचानक अनात्मीयता हो जाए—
तब मन समझता है
कि सबसे गहरी चोट
दिखाई नहीं देती,
केवल सह ली जाती है।
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✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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