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कर के नव शृंगार

कर के नव शृंगार

       ---:भारतका एक ब्राह्मण.
          संजय कुमार मिश्र"अणु"
मेरी सपना
सज रही है।
अपने को
तज रही है।।
       नये लोग
       नया आंगन।
       देखो दे रहा है
       आज निमंत्रण।।
जीवन की आशा
प्रेम की परिभाषा।
मनोनुकूल होगा
हर दांव ये पासा।।
          केवल पाना है
          यही ठाना है।
          जो हो गया
          उसे भुलाना है।।
मन की नादानी
बनाई थी दीवानी।
लेकिन अब मुझे
नहीं करनी मनमानी।।
              तेरे साथ रहूंगी
              यही है फैसला।
              खुश रखोगे मुझे
              है मेरा दिल बोला।।
आज से तुम और हम
हुए एक दूसरे के हमदम।
मैं तुम्हारी प्रिया बन गई
और तुम मेरे प्रियतम।।
            मुझे कर रहे.हो स्वीकार,
            कहो न केवल एक बार।
            सबकुछ छोडकर आ गई
            कर के नव शृंगार।।
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वलिदाद, अरवल(बिहार)
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