नेतृत्व ने दिया फडणवीस को सबक
(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
भाजपा का नेतृत्व यह संकेत बहुत ही स्पष्ट रूप से दे देता है कि पार्टी को नुकसान पहुंचाने वाले को सजा भोगनी ही पड़ेगी। महाराष्ट्र मंे यही सजा पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस को मिल रही है। पार्टी ने कभी फडणवीस को फर्श से अर्श पर पहुंचाकर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। मुख्यमंत्री के रूप मंे नेतृत्व ने पूरा समर्थन भी किया लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव मंे फडणवीस ने विनोद तावड़े और चंद्रशेखर बावनकुले को किनारे करके ओवीसी और मराठों को नाराज कर दिया था। इतना ही नहीं चुनाव के बाद सरकार बनाने को लेकर शिवसेना के साथ जिस तरह की जिद फडणवीस ने दिखाई, उसको भी नेतृत्व अब पार्टी के हित में नहीं मान रहा है। इसीलिए तावड़े और बावनकुले को अब महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गयी है। दोनों नेताओं के इस प्रमोशन को देवेन्द्र फडणवीस के लिए सबक बताया जा रहा है।
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र में अपनी ही पार्टी में अकेले और कमजोर पड़ रहे हैं, जिन्हें एक समय महाराष्ट्र में बीजेपी का नया चेहरा कहा जाता था, जो टेक-सेवी थे और अगली पीढ़ी के हिंदुत्ववादी नेता थे और जिनमें राष्ट्रीय स्तर की राजनीति की क्षमता थी। बीते दिनों पार्टी ने विनोद तावड़े को महासचिव के पद पर प्रमोट किया है। पहले वह राष्ट्रीय सचिव के पद थे। इसके साथ ही महाराष्ट्र विधानसभा परिषद चुनाव के लिए चंद्रशेखर बावनकुले का नामांकन हुआ है। ये दोनों नेता फडणवीस के धुर विरोधी माने जाते हैं। पार्टी के इन फैसलों को एक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व महाराष्ट्र में अपने पोस्टर बॉय के पर कतर रहा है। साथ ही 2024 के चुनाव में देवेंद्र फडणवीस के पार्टी का चेहरा बने रहने की उम्मीदें भी दम तोड़ रही हैं।
ये बात ध्यान रखने वाली है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान फडणवीस ने तावड़े को साइडलाइन किया हुआ था। तावड़े पहले शिक्षा मंत्री थे, फिर उनका कैबिनेट पोर्टफोलियो बदल कर छोटा कर दिया गया और फिर 2019 के विधानसभा चुनावों के लिए उन्हें टिकट भी नहीं मिला। इसी तरह बावनकुले भी पूर्व में महाराष्ट्र के बिजली मंत्री रह चुके हैं और नागपुर क्षेत्र में एक मजबूत ओबीसी नेता के तौर पर दखल रखते हैं, जिन्हें केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का करीबी माना जाता है। बावनकुले को भी विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं मिला था। परिणाम ये हुआ कि विदर्भ क्षेत्र में बीजेपी को कम से कम 6 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। माना जा रहा है कि विधानसभा
चुनावों में तावड़े और बावनकुले को टिकट ना देना एक बड़ी भयंकर भूल थी।
विधानसभा चुनावों के दौरान तावड़े और बावनकुले को टिकट नहीं देने के फैसले को उस समय साहस भरा निर्णय करार दिया गया था, लेकिन विधानसभा क्षेत्रों में भ्रम की स्थिति बन गई थी और पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा था। परिषदीय चुनाव के लिए बावनकुले के नामांकन को विदर्भ में तेली समुदाय के बीच बीजेपी द्वारा अपनी पकड़ को मजबूत करने के तौर पर देखा जा रहा है, जब महाराष्ट्र और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की छवि जातीय जनगणना के विरोधी की दिख रही है। साथ ही इसे फडणवीस के मुकाबले नितिन गडकरी को मजबूत करने के तौर पर भी देखा जा रहा है। महाराष्ट्र में फडणवीस द्वारा किनारे लगा दिए गए एक और नेता और राज्य में पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राव साहेब दानवे अब केंद्र की सरकार में रेल मंत्रालय और कोयला एवं खनन मंत्रालय में केंद्रीय राज्य मंत्री हैं। विनोद तावड़े कहते हैं ‘राजनीति में धैर्य का फायदा मिलता है। ये पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं के लिए स्पष्ट संदेश है।’
फडणवीस द्वारा साइड कर दिए जाने के बाद बीजेपी छोड़कर शरद पवार की एनसीपी में शामिल हुए एकनाथ खड़से ने दो टूक जवाब दिया और कहा, ‘सभी के लिए स्पष्ट संदेश था। लेकिन ये सिर्फ समय का फेर था। फडणवीस ने गंदी राजनीति की। उन्होंने अपने सभी राजनीतिक प्रतिस्पर्धियों को खत्म कर दिया। ये इसलिए हुआ क्योंकि केंद्रीय नेतृत्व ने उन पर भरोसा जताया था लेकिन बहुत जल्द ही चीजें खुलकर सामने आ गई हैं। मैंने बीजेपी इसलिए छोड़ी क्योंकि मैं उत्पीड़न से परेशान हो गया था। मैंने बीजेपी केवल और केवल फडणवीस के चलते ही छोड़ी।’ हालांकि विनोद तावड़े के प्रमोशन पर देवेंद्र फडणवीस का रिएक्शन बहुत नपा तुला था। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा, ‘मैं खुश हूं कि विनोद जी तावड़े को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। ये एक महत्वपूर्ण भूमिका है, बीते समय में इस जिम्मेदारी को स्वर्गीय गोपीनाथ मुंडे और प्रमोद महाजन ने भी निभाया है।’ हालांकि फडणवीस के एक करीबी नेता ने कहा कि सिर्फ टिकट बंटवारे और कैबिनेट में पद को लेकर फडणवीस को टारगेट करना अन्याय है, क्योंकि ये फैसले कोर कमेटी के स्तर पर लिये गए हैं और केंद्रीय नेतृत्व ने भी इसे मंजूरी दी थी।
हालांकि बीजेपी में, देवेंद्र फडणवीस के बतौर मुख्यमंत्री 5 साल के कार्यकाल को सफल करार दिया गया, जिसमें उन्होंने ‘गुड गवर्नेंस’ को आगे बढ़ाया। लेकिन लोगों का ये भी कहना है कि फडणवीस संगठन के नेता और टीम लीडर के तौर पर खुद को उभारने में नाकाम रहे हैं। अप्रैल 2013 में जब उन्हें महाराष्ट्र में बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया था, तो उन्हें नितिन गडकरी और गोपीनाथ मुंडे के परंपरागत विरोधी धड़ों के बीच एकजुटता लाने के तौर पर देखा गया था। 8 साल बाद पार्टी के इनसाइडर्स का मानना है कि बीजेपी और शिवसेना के बीच 25 साल पुराने गठबंधन में टूट के लिए फडणवीस ही जिम्मेदार हैं, साथ ही पार्टी में अपने प्रतिस्पर्धियों के प्रति शत्रुता के भाव ने गुटबाजी को बढ़ा दिया है। गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे के साथ देवेंद्र फडणवीस की खुलेआम लड़ाई ने पार्टी में कई नेताओं को नाराज कर दिया था, जिसे इसी साल 3 जून को गोपीनाथ मुंडे के सम्मान में टिकट जारी करके ठीक करने की कोशिश की गई है। इसी मौके पर पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने अपने भाषण में गोपीनाथ मुंडे की जबरदस्त तारीफ की थी, शायद यही वह पहला मौका था, जब पार्टी ने देवेंद्र फडणवीस के प्रति अपनी नाराजगी का पहला संकेत दिया। ‘फडणवीस की यह गलती रही कि उन्होंने महत्वपूर्ण मुद्दों पर बाहरी लोगों पर भरोसा किया। शिवसेना और बीजेपी के गठबंधन पर बात करने के लिए उन्होंने नीरज गुंडे
पर भरोसा जताया और सभी अनुभवी नेताओं को किनारे कर दिया गया। (हिफी)
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