तेरे रेशमी कृष्ण-कुंतलों पर, प्रणय निर्झर बह जाता है

तेरे रेशमी कृष्ण-कुंतलों पर, प्रणय निर्झर बह जाता है

कुमार महेंद्र
श्यामल अलकें मुखमंडल पर,
ज्यों निशि में चंद्र खिला।
घुँघराली इन लटों में उलझा,
मन प्रेम-सुधा में जा मिला।
तेरी अलकों की छाया में,
अंतर्मन असीम सुख पाता है।
तेरे रेशमी कृष्ण-कुंतलों पर, प्रणय निर्झर बह जाता है।।


चंदन-सा महके रूप सलोना,
कस्तूरी-सी गंध निराली।
रेशमी चिकुरों में उलझा,
मन भूले जग की सुधि सारी।
तू मंद-मंद जब मुस्काए,
हृदय में प्रेम उमड़ आता है।
तेरे रेशमी कृष्ण-कुंतलों पर, प्रणय निर्झर बह जाता है।।


ये केश माथे पर लहराएँ,
ज्यों शरद पूर्णिमा का चाँद।
तेरे नयनों की गहराई में,
गूँजे नेह-अमृत का नाद।
जब अलकें तेरी बिखरें,
चित्त प्रीतिगान सुनाता है।
तेरे रेशमी कृष्ण-कुंतलों पर, प्रणय निर्झर बह जाता है।।


नीलमणि-सी आभा इनमें,
ज्यों कालिंदी की जलधार।
इन श्यामल केशपाश में बँधा,
अंतःकरण का अनुराग अपार।
तू बाँध इन्हें या मुक्त रखे,
मनवा तुझमें ही रम जाता है।
तेरे रेशमी कृष्ण-कुंतलों पर, प्रणय निर्झर बह जाता है।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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