महाष्टमी की तिथि को लेकर भ्रम से बचें, शास्त्रीय गणना के अनुसार रविवार को ही होगा व्रत और निशापूजा
पं. प्रेम सागर पाण्डेय
- देश में अष्टमी-नवमी की तिथि को लेकर फैल रही भ्रांतियों के बीच पंचांग की सही गणना और शास्त्रीय परंपरा को समझना आवश्यक
पटना। शारदीय नवरात्र में महाष्टमी और महानवमी की तिथियों को लेकर इन दिनों देश में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है। विशेष रूप से इंटरनेट और सोशल मीडिया पर उपलब्ध अधूरी जानकारियों तथा कुछ ऑनलाइन पंचांगों के आधार पर श्रद्धालुओं के बीच असमंजस फैल रहा है। ऐसे में आवश्यक है कि तिथि का निर्धारण केवल प्रचलित चर्चाओं अथवा इंटरनेट पर उपलब्ध अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर न किया जाए, बल्कि सूर्योदय, तिथि की अवधि और शास्त्रीय परंपराओं के समुचित विचार के साथ किया जाए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्र की अष्टमी तिथि पर महाष्टमी व्रत, माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की पूजा तथा रात्रिकालीन निशापूजा का विशेष महत्त्व है। वहीं नवमी तिथि पर नवमी पूजन, हवन और कुमारी पूजन की परंपरा प्रचलित है। इन धार्मिक अनुष्ठानों की तिथि निर्धारित करने में पंचांग की गणना और संबंधित व्रत के शास्त्रीय नियमों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।
उपलब्ध तिथि-गणना के अनुसार, रविवार को सूर्योदय से पूर्व ही अष्टमी तिथि विद्यमान रहेगी और पूरे दिन-रात्रि इसकी व्याप्ति रहने की बात कही जा रही है। सोमवार को भी अष्टमी तिथि प्रातः 7 बजकर 53 मिनट तक रहने के बाद नवमी तिथि प्रारंभ होगी। इस गणना के आधार पर रविवार को महाष्टमी व्रत, माँ महागौरी की आराधना तथा निशापूजा संपन्न करने का विधान बताया जा रहा है। इसके बाद सोमवार को प्रातः 8 बजे से नवमी पूजा, हवन तथा कुमारी पूजन करना शास्त्रसम्मत माना जा रहा है।
श्रद्धालुओं को यह समझना चाहिए कि हिंदू धर्म में तिथि का निर्धारण केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख देखकर नहीं किया जाता। तिथि चंद्रमा और सूर्य की पारस्परिक स्थिति पर आधारित होती है, इसलिए उसका आरंभ और समापन सामान्य दिन-रात्रि की गणना से अलग समय पर हो सकता है। इसी कारण किसी व्रत या पूजा के लिए केवल तिथि का नाम जानना पर्याप्त नहीं होता; यह देखना भी आवश्यक है कि संबंधित धार्मिक विधान के अनुसार उस तिथि का कौन-सा काल महत्त्वपूर्ण है।
इंटरनेट पर उपलब्ध सूचनाओं को अंतिम प्रमाण मान लेना भी उचित नहीं है। ऑनलाइन पंचांगों में स्थान, समय-क्षेत्र, गणना-पद्धति अथवा धार्मिक परंपरा के अंतर के कारण अलग-अलग विवरण दिखाई दे सकते हैं। इसलिए श्रद्धालुओं को चाहिए कि वे स्थानीय मान्य पंचांग, योग्य आचार्य और संबंधित व्रत के शास्त्रीय विधान के आधार पर निर्णय लें। किसी भी मतभेद की स्थिति में संबंधित तिथि की गणना और उसके पीछे दिए गए शास्त्रीय आधार को स्पष्ट करना अधिक उचित है, न कि एक-दूसरे की मान्यताओं पर अनावश्यक विवाद करना।
माँ दुर्गा की उपासना श्रद्धा, शुद्धता और अनुशासन का पर्व है। महाष्टमी हो अथवा महानवमी, दोनों ही तिथियाँ शक्ति की आराधना, आत्मसंयम और लोककल्याण की भावना से जुड़ी हैं। इसलिए तिथि को लेकर किसी भी प्रकार का भ्रम दूर करने के लिए प्रमाणिक गणना और शास्त्रीय विवेचन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।अतः प्रस्तुत गणना के अनुसार महाष्टमी व्रत, महागौरी पूजन और निशापूजा रविवार को तथा नवमी पूजा, हवन और कुमारी पूजन सोमवार को करने का मत सामने आ रहा है। श्रद्धालुओं से आग्रह है कि अंतिम निर्णय से पहले अपने क्षेत्र के प्रमाणिक पंचांग में तिथि के आरंभ-समापन का समय तथा संबंधित पूजा-विधान की पुष्टि अवश्य कर लें, ताकि धार्मिक अनुष्ठान श्रद्धा और शास्त्रीय मर्यादा के अनुरूप संपन्न हो सकें।
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