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मतलबी है लोग यहाँ, मतलबी ज़माना, सोचा था साथ देगा, निकला वो बेगाना|

मतलबी है लोग यहाँ, मतलबी ज़माना, सोचा था साथ देगा, निकला वो बेगाना|

  • रिश्तों के बाजार में इंसान आखिर कहाँ है?
डॉ. राकेश दत्त मिश्र

आज मनुष्य चाँद तक पहुँच गया है, तकनीक ने दुनिया को मुट्ठी में कर दिया है, सोशल मीडिया ने हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों को एक क्लिक में जोड़ दिया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इंसान इंसान के करीब भी आया है?

शायद नहीं।

बल्कि कई बार तो ऐसा लगता है कि हम तकनीकी रूप से जितने आधुनिक हुए हैं, संवेदनाओं के स्तर पर उतने ही गरीब होते चले गए हैं।

आज संबंधों की गर्माहट कम और स्वार्थ की गर्मी अधिक दिखाई देती है। दोस्ती में फायदा तलाशा जा रहा है, रिश्तेदारी में अवसर देखा जा रहा है, सामाजिक संबंधों में प्रभाव का हिसाब लगाया जा रहा है और सम्मान भी कई बार व्यक्ति के चरित्र से नहीं, उसकी उपयोगिता से तय होने लगा है।

इसीलिए आज मन के भीतर से एक कड़वी आवाज निकलती है-

“मतलबी है लोग यहाँ, मतलबी ज़माना,
सोचा था साथ देगा, निकला वो बेगाना।”
जब तक काम है, तब तक आप महान हैं!

आज का सबसे बड़ा सामाजिक सत्य शायद यही है कि जब तक किसी व्यक्ति से काम निकल रहा है, तब तक वह महान है।

उसके सामने प्रशंसा के शब्दों की बौछार होगी।

उसके फोन पर लगातार फोन आएंगे।

उसके घर तक लोग पहुंचेंगे।

उसके आगे-पीछे घूमने वाले लोग मिलेंगे।

उसकी हर बात में सहमति जताई जाएगी।

लेकिन जैसे ही काम निकल गया, वही व्यक्ति अचानक “व्यस्त” हो जाता है।

फोन का जवाब नहीं।

मुलाकात का समय नहीं।

पहचानने में भी संकोच।

कल तक जो व्यक्ति “भाई साहब”, “गुरुजी”, “सर” या “नेता जी” था, आज वही अचानक एक ऐसा व्यक्ति बन जाता है जिससे कोई लेना-देना ही नहीं।

यह संबंध है या सौदा?

यह मित्रता है या उपयोग?

यह सम्मान है या स्वार्थ?
आपके आगे दुम हिलाने वाले, पीछे गुर्राने लगते हैं

सामाजिक जीवन का एक विचित्र चरित्र विकसित हो गया है।

जब तक किसी व्यक्ति से लाभ की उम्मीद रहती है, उसके सामने अत्यधिक विनम्रता दिखाई जाती है। उसके हर निर्णय की प्रशंसा होती है और उसकी हर बात पर सिर हिलाया जाता है।

लेकिन जैसे ही स्वार्थ समाप्त होता है, वही विनम्रता आक्रामकता में बदल जाती है।

कल तक जो आपके सामने दुम हिला रहा था, आज वही आपके सामने शेर की तरह गुर्राने लगता है।

कल तक आपके गुण गिनाने वाला आज आपके दोषों की सूची लेकर बैठ जाता है।

कल तक आपके साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए उत्सुक व्यक्ति आज आपको पहचानने से बचता है।

क्या यही हमारा सामाजिक चरित्र है?

अगर हाँ, तो फिर हमें अपने आप से पूछना होगा-
क्या हम सचमुच सामाजिक प्राणी हैं या केवल स्वार्थी प्राणी?
पद गया तो पहचान गई!

आज समाज में व्यक्ति और उसके पद के बीच का अंतर मिटता जा रहा है।

कई लोग व्यक्ति का सम्मान नहीं करते, वे उसके पद का सम्मान करते हैं।

पद है तो प्रणाम।

कुर्सी है तो सम्मान।

अधिकार है तो मित्रता।

पैसा है तो रिश्तेदारी।

प्रभाव है तो भीड़।

लेकिन जैसे ही पद चला गया, कुर्सी चली गई, पैसा कम हो गया या प्रभाव समाप्त हो गया-अचानक वही भीड़ गायब!

तब पता चलता है कि आपके साथ खड़े लोग आपके साथ थे या आपकी कुर्सी के साथ।

कुर्सी की परिक्रमा करने वालों को अपना समझना जीवन की सबसे बड़ी भूल है।
सोशल मीडिया ने रिश्ते बढ़ाए या दिखावा?

आज सोशल मीडिया पर हजारों मित्र हैं।

जन्मदिन पर सैकड़ों शुभकामनाएं।

उपलब्धि पर हजारों प्रतिक्रियाएं।

तस्वीर पर सैकड़ों “लाइक”।

लेकिन जब वास्तविक जीवन में संकट आता है तो कितने लोग आपके दरवाजे तक पहुंचते हैं?

यही अंतर है डिजिटल संबंध और वास्तविक संबंध में।

सोशल मीडिया पर संवेदनाएं व्यक्त करना आसान है।

किसी पोस्ट पर “बहुत दुख हुआ” लिखना आसान है।

लेकिन किसी दुखी व्यक्ति के घर जाकर उसके पास चुपचाप बैठना कठिन है।

किसी के आँसू पोंछना कठिन है।

किसी की समस्या अपने कंधे पर लेना कठिन है।

आज हमें “लाइक” करने वाले बहुत मिल जाएंगे, लेकिन जीवन में “साथ” देने वाले कितने हैं?
दुख में जो गायब हो जाए, उसे सुख में क्यों बुलाएं?

यह प्रश्न हर व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए।

जब आप परेशानी में थे, तब कौन आपके साथ था?

जब आपके पास कोई पद नहीं था, तब कौन आपके पास था?

जब आप आर्थिक या सामाजिक कठिनाई में थे, तब किसने आपका हाथ पकड़ा?

जब दुनिया आपकी आलोचना कर रही थी, तब किसने कहा-“मैं तुम्हारे साथ हूँ”?

इन प्रश्नों के उत्तर ही आपके वास्तविक रिश्तों की सूची हैं।

बाकी सब परिचित हैं।

और परिचितों की भीड़ को मित्र समझ लेना स्वयं के साथ धोखा है।
स्वार्थी लोगों से नाराज मत होइए, उन्हें पहचानिए

हर स्वार्थी व्यक्ति से लड़ना आवश्यक नहीं है।

किसी को गाली देकर, किसी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करके या हर संबंध तोड़कर समस्या का समाधान नहीं होगा।

सबसे बड़ा उत्तर है-पहचान।

जिसे पहचान लिया, उससे अपेक्षा समाप्त कर दीजिए।

जिससे अपेक्षा समाप्त हो गई, उससे शिकायत भी समाप्त हो जाएगी।

और जिस दिन शिकायत समाप्त हो गई, उसी दिन मनुष्य भीतर से स्वतंत्र हो जाएगा।

इसलिए जीवन का सूत्र सरल है-

लोगों को बदलने की कोशिश मत कीजिए।
लोगों को पहचानिए।
अपनी सीमाएं तय कीजिए।
और अपना आत्मसम्मान बचाकर रखिए।
समाज में सबसे बड़ा संकट गरीबी नहीं, संवेदनाओं की गरीबी है

हम आर्थिक विकास की बातें करते हैं।

हम आधुनिकता की बातें करते हैं।

हम डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी और नई तकनीक की बातें करते हैं।

लेकिन क्या हमने यह पूछा कि हमारे समाज में संवेदना कितनी बची है?

क्या पड़ोसी को पड़ोसी का दुख पता है?

क्या मित्र अपने मित्र की परेशानी समझता है?

क्या रिश्तेदार केवल समारोहों में दिखाई देने के लिए हैं?

क्या समाज केवल सोशल मीडिया पोस्ट और औपचारिक संवेदनाओं तक सीमित रह गया है?

अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु पर हम दो मिनट की श्रद्धांजलि लिख सकते हैं, लेकिन उसके परिवार के संकट में दो घंटे खड़े नहीं हो सकते, तो हमें अपनी संवेदनशीलता पर पुनर्विचार करना चाहिए।
रिश्ते खून से नहीं, व्यवहार से जीवित रहते हैं

रक्त संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल रक्त संबंध किसी रिश्ते को जीवित नहीं रखते।

रिश्ते जीवित रहते हैं विश्वास से।

सम्मान से।

त्याग से।

समय देने से।

संकट में खड़े होने से।

और सबसे बढ़कर—निस्वार्थ भाव से।

कई बार कोई अपना होकर भी पराया व्यवहार करता है और कोई गैर होकर भी अपने से बढ़कर साथ देता है।

इसलिए रिश्ते की पहचान नाम से नहीं, व्यवहार से होनी चाहिए।
अब समय है आत्ममंथन का

हम दूसरों को मतलबी कहते हैं।

लेकिन क्या हमने कभी स्वयं से पूछा कि कहीं हम भी तो किसी के साथ स्वार्थपूर्ण व्यवहार नहीं कर रहे?

क्या हम केवल जरूरत पड़ने पर किसी को याद करते हैं?

क्या हम भी पद और पैसे के आधार पर लोगों का मूल्यांकन करते हैं?

क्या हम भी प्रभावशाली व्यक्ति के सामने अलग और कमजोर व्यक्ति के सामने अलग व्यवहार करते हैं?

अगर हाँ, तो समस्या केवल समाज में नहीं है।

समस्या हममें भी है।

सुधार की शुरुआत हमेशा दूसरों से नहीं, स्वयं से होनी चाहिए।
अंततः कौन साथ रहता है?

जीवन की लंबी यात्रा के अंत में व्यक्ति पीछे मुड़कर देखता है तो उसे समझ आता है कि भीड़ बहुत थी, लेकिन अपने बहुत कम थे।

बहुत लोगों ने हाथ मिलाया था, लेकिन बहुत कम लोगों ने हाथ थामा था।

बहुत लोगों ने मुस्कुराकर स्वागत किया था, लेकिन बहुत कम लोगों ने आँसू देखकर पूछा था—“क्या हुआ?”

बहुत लोगों ने सफलता में बधाई दी थी, लेकिन बहुत कम लोग असफलता में साथ खड़े हुए थे।

यही जीवन का सच है।

इसलिए अब किसी के पीछे भीड़ देखकर प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं।

किसी की मीठी बातों से भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं।

किसी के बार-बार प्रशंसा करने से उसे अपना मान लेने की आवश्यकता नहीं।

समय को परीक्षा लेने दीजिए।

समय बताएगा कि कौन आपके साथ था और कौन केवल आपके साथ होने का अभिनय कर रहा था।

और अंत में फिर वही कड़वा लेकिन सच्चा सवाल-

जब मतलब हो तो दुम हिलाना और मतलब खत्म होते ही गुर्राना-
क्या यही आज के सामाजिक प्राणी इंसान की पहचान है?

अगर जवाब “नहीं” है, तो फिर हमें अपने व्यवहार से उस “नहीं” को साबित करना होगा।

क्योंकि समाज भाषणों से नहीं बदलता।

समाज बदलता है व्यवहार से।

और शायद आज सबसे ज्यादा जरूरत इसी बात की है कि हम दूसरों से सच्चाई की अपेक्षा करने से पहले स्वयं सच्चे बनें।

मतलबी जमाना चाहे जितना हो,
हमें मतलबी इंसान बनने की मजबूरी नहीं है।

डॉ. राकेश दत्त मिश्र
संपादक, दिव्य रश्मि

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