एक दीप राष्ट्र के नाम

एक दीप राष्ट्र के नाम

अरुण दिव्यांश

बस एक दीप ,
एक दीप स्वयं हेतु जला ले ,
दीप जला तू भाग्य जगा ले ,
एक दीप कर राष्ट्र के नाम ,
एक दीप से ईर्ष्या मिटा ले ,
बस एक दीप ।


एक दीप अंतर्मन जगाता ,
एक दीप है पथ दिखाता ,
एक दीप है शीर्ष पहुॅंचाता ,
एक दीप प्रकाश फैलाता ,
बस एक दीप ।


छोटा सा होता एक दीप ,
छोटा ही होता एक सीप ,
श्वाती नक्षत्र बूॅंद जो पड़े ,
सीप ही मोती बन जाए ,
बस एक दीप ।


एक दीप ज्योति फैलाए ,
जैसे खग ये पंख फैलाए ,
एक दीप कीचड़ से उठा ,
ले जा ये क‌मल पर बैठाए ,
बस एक दीप ।


माना ज्योति जब जलते हैं ,
जिसपे कीड़े भी पलते हैं ,
मर जाते कीड़े जल जलकर ,
ज्योति सदा ही फलते हैं ,
बस एक दीप ।


एक दीप ही हमें जगाता है ,
सुंदर भूमिका ये निभाता है ,
सबको प्रोत्साहन ही देता है ,
सबका ये विश्वास बढाता है ,
बस एक दीप ।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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