तुम लगती शरद पूर्णिमा-सी

तुम लगती शरद पूर्णिमा-सी

कुमार महेंद्र
नभ से उतरी परी-सी सुंदर,
मन की मधुरिम आस हो तुम।
तप्त मरुस्थल-से जीवन में,
शीतल जल का आभास हो तुम।
चंद्रकिरण-सी छवि मनोहर,
प्रणय-प्रीति की गरिमा-सी।
तुम लगती शरद पूर्णिमा-सी।।


लहरों जैसी चंचल चितवन,
सागर जैसी गहराई।
तुमने आकर मेरे मन में,
प्रेम-सुधा की ज्योति जलाई।
पलकें झुकतीं, अधर मुसकाते,
लज्जा की मधुरिम लालिमा-सी।
तुम लगती शरद पूर्णिमा-सी।।


अधरों पर मुसकान तुम्हारी,
ज्यों उषा की अरुणिम लाली।
तुमसे महकी जीवन-वाटिका,
खिली प्रेम की डाली-डाली।
श्वास-श्वास में गंध चंदन की,
प्रीत की जीवंत प्रतिमा-सी।
तुम लगती शरद पूर्णिमा-सी।।


जब तक नभ में चाँद रहेगा,
तब तक प्रीत हमारी होगी।
जब तक साँसों के स्वर गूँजें,
मन में छवि तुम्हारी होगी।
जन्म-जन्म का साथ हमारा,
अमर प्रेम की ज्योत्स्ना-सी।
तुम लगती शरद पूर्णिमा-सी।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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