बुजुर्ग बोझ क्यों

बुजुर्ग बोझ क्यों

अरुण दिव्यांश
बड़े लाड़ प्यार से पोषा पाला ,
बड़े जतन से तुझे देखा भाला ,
भरोसा किया था मैंने तुमसे ,
यह क्या तुमने किया लाला ।
मैंने बोझ समझा नहीं तुझे ,
तूने बोझ समझ लिया मुझे ,
कौन ऐसा तेरा हुआ है गुरु ,
ऊॅंच नीच यह जिसे न सूझे ।
इसे समझूॅं निज कर्म दोष ,
या समझूॅं संस्कार की कमी ,
या धरा सा बंजर मैं समझूॅं ,
जिसमें यह बीज ही न जमी ।
हुए आज हम दोनों वृद्ध हैं ,
इक रोज तुम्हें वृद्ध होना है ,
मैं इक दिन जवानी ये खोया ,
तुम्हें भी जवानी ये खोना है ।
न कोई अमर इस दुनिया में ,
न ही जवानी अजर अमर है ,
जबतक तन जवाॅं है जवानी ,
तभी तक संघर्षरत समर है ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ