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"किराएदार कौन था?"

"किराएदार कौन था?"

पंकज शर्मा
मैंने स्वयं से पूछा—
अपने ही घर में
मैं किराएदार क्यों था?


भीतर से कोई उत्तर नहीं आया।
केवल दीवारों ने
चुपचाप कहा—
घर होना
और अपना होना
एक बात नहीं।


मैंने फिर पूछा—
ये अधूरे ख़्वाब
किसके थे?
मेरे—
या उन आँखों के,
जिन्होंने मुझे
मेरे होने से पहले
परिभाषित कर दिया था?


साँसें भी
कभी अपनी होती हैं?
हर श्वास
समय से उधार ली हुई—
फिर किस अधिकार से
मैं जीवन को
अपना कहता रहा?


मैंने खिड़की खोली—
बाहर आकाश था।
न किसी का घर,
न किसी की छत।
तब समझा—
सीमाएँ बाहर कम,
भीतर अधिक होती हैं।


मैंने अंतिम बार पूछा—
क्या सितारों पर
मेरा सचमुच कोई हक़ है?


इस बार
भीतर से भी
कोई उत्तर नहीं आया।


मैं मुस्कराया—
हक़ किससे माँगूँ?
आकाश को अपना कहने से पहले
मैं स्वयं से पूछूँ—
क्या मैं स्वयं का हूँ?


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान
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