रैपिडो से ‘रेपिडो जेहाद’ तक, सुरक्षा व्यवस्था में आखिर छेद कहाँ है?
आज के दौर में किसी बेटी का घर से निकलना केवल उसके स्कूल, कॉलेज या कार्यालय जाने की सामान्य घटना नहीं रह गई है। उसके घर से निकलते ही माता-पिता की चिंता भी उसके साथ चल पड़ती है—वह किस वाहन में बैठी, चालक कौन है, रास्ते में कौन मिला, वह सुरक्षित पहुंची या नहीं और घर कब वापस लौटेगी। तकनीक ने निश्चित रूप से हमारी जिंदगी को आसान बनाया है। मोबाइल पर कुछ क्लिक करते ही बाइक टैक्सी या कैब घर के दरवाजे पर पहुंच जाती है और कुछ ही मिनटों में हमें अपनी मंजिल तक पहुंचा देती है। लेकिन सुविधा के इस चमकते संसार के पीछे एक ऐसा प्रश्न भी खड़ा हो रहा है, जिससे अब मुंह नहीं मोड़ा जा सकता—क्या जिस तकनीक ने हमारी यात्रा को आसान बनाया है, उसने हमारी सुरक्षा को भी उतना ही मजबूत बनाया है?
कुछ दिन पहले एक ऐसी घटना सामने आई जिसने इस प्रश्न को और गंभीर बना दिया। बाइक टैक्सी की बुकिंग में ऐप पर जिस चालक का नाम और पहचान दिखाई दे रही थी, वास्तविक रूप से राइड देने पहुंचा व्यक्ति उससे अलग था। पूछताछ करने पर चालक ने बताया कि वह किसी दूसरे व्यक्ति की ID पर राइड कर रहा है, क्योंकि उसकी अपनी ID कंपनी द्वारा बंद कर दी गई है। यात्री ने सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए राइड रद्द कर दी और संबंधित कंपनी तथा प्रशासन को शिकायत भेजी। कंपनी की ओर से कार्रवाई का आश्वासन भी दिया गया। लेकिन घटना यहीं समाप्त नहीं हो जाती। असली सवाल तो अब शुरू होता है—यदि यात्री ने पहचान की जांच नहीं की होती तो? यदि वह व्यक्ति बिना किसी सवाल के वाहन में बैठ जाता तो? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह कि जिस व्यक्ति की ID कंपनी ने बंद कर दी, वह किसी दूसरे व्यक्ति की ID के सहारे फिर सड़क पर कैसे आ गया?
ऐप आधारित परिवहन व्यवस्था की पूरी नींव ही विश्वास पर टिकी है। यात्री ऐप पर चालक का नाम देखता है, उसकी तस्वीर देखता है, वाहन का नंबर देखता है और फिर यह विश्वास करके वाहन में बैठता है कि सामने वही व्यक्ति है जिसकी जानकारी कंपनी ने उसे दी है। लेकिन यदि ऐप पर पहचान किसी और की हो और वाहन लेकर कोई दूसरा व्यक्ति पहुंचे, तो डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था का अर्थ ही क्या रह जाता है? किसी चालक की ID बंद कर देना तभी प्रभावी कार्रवाई है जब यह भी सुनिश्चित किया जाए कि वह किसी दूसरे व्यक्ति की ID का इस्तेमाल करके दोबारा सिस्टम में प्रवेश न कर सके। केवल ID ब्लॉक कर देना पर्याप्त नहीं है। कंपनी को यह बताना होगा कि वास्तविक चालक की पहचान कैसे सत्यापित होती है, क्या चेहरे का मिलान किया जाता है, क्या समय-समय पर KYC दोबारा होता है, क्या वाहन और चालक का वास्तविक समय में सत्यापन किया जाता है और क्या दूसरे व्यक्ति की ID इस्तेमाल करने वाले चालक के विरुद्ध तत्काल और कठोर कार्रवाई होती है।
महिला सुरक्षा के संदर्भ में यह प्रश्न और गंभीर हो जाता है। आज हजारों छात्राएं, कामकाजी महिलाएं और अन्य महिला यात्री बाइक टैक्सी तथा कैब सेवाओं का उपयोग करती हैं। उनके लिए ऐप पर दिखाई देने वाली चालक की पहचान केवल एक औपचारिक सूचना नहीं, बल्कि सुरक्षा का पहला आधार है। यदि सामने वाला व्यक्ति ऐप पर दिखाई देने वाले व्यक्ति से अलग है तो महिला को बिना किसी संकोच के राइड रद्द करने का अधिकार होना चाहिए। उसे यह सोचने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि चालक क्या कहेगा, नाराज होगा या उसके सामने कोई बहाना बनाना पड़ेगा। सुरक्षा के मामले में किसी यात्री को किसी अजनबी के सामने स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
लेकिन खतरा केवल फर्जी ID तक सीमित नहीं है। एक दूसरा संभावित जोखिम उससे कहीं अधिक सूक्ष्म है। कल्पना कीजिए कि कोई छात्रा या कामकाजी महिला रोज लगभग एक ही समय पर घर से निकलती है और लगभग एक ही मार्ग से अपने कार्यालय या कॉलेज जाती है। उसे कई बार वही चालक मिल जाता है। पहली बार सामान्य बातचीत होती है। दूसरी बार चालक पहचानने लगता है। तीसरी या चौथी बार वह यह पूछ सकता है कि आप रोज इसी समय जाती हैं? आपका ऑफिस कहां है? रोज इतनी दूर जाना पड़ता है? धीरे-धीरे बातचीत बढ़ सकती है और फिर एक दिन वह कह सकता है कि ऐप से रोज बुकिंग करने की क्या जरूरत है, मैं तो रोज इसी रास्ते से जाता हूं, आपको कम पैसे में छोड़ दिया करूंगा। पहली नजर में यह प्रस्ताव आर्थिक सुविधा जैसा दिखाई दे सकता है, लेकिन यहीं से सुरक्षा का एक नया जोखिम पैदा हो सकता है।
ऐप से बाहर जाकर निजी वाहन में नियमित यात्रा करने का अर्थ है कि यात्री धीरे-धीरे उस सुरक्षा व्यवस्था से बाहर निकल रही है, जो ऐप उसे प्रदान करता है। ऐप की बुकिंग में यात्रा का डिजिटल रिकॉर्ड होता है, चालक की पहचान दर्ज होती है, वाहन का विवरण उपलब्ध होता है और शिकायत की स्थिति में कंपनी के पास रिकॉर्ड रहता है। लेकिन जब वही यात्रा निजी समझौते में बदल जाती है, तब जवाबदेही का एक बड़ा हिस्सा समाप्त हो जाता है। कुछ रुपये बचाने के लिए अपनी सुरक्षा की पूरी व्यवस्था को कमजोर करना किसी भी दृष्टि से समझदारी नहीं हो सकती।
यहां एक और गंभीर प्रश्न उठना चाहिए—क्या ऐप कंपनियों के पास ऐसे व्यवहार की पहचान करने की कोई व्यवस्था है? क्या लगातार एक ही चालक द्वारा एक ही क्षेत्र में राइड लेने के पैटर्न का कोई सुरक्षा विश्लेषण होता है? क्या किसी महिला यात्री से निजी मोबाइल नंबर मांगने या ऐप से बाहर यात्रा करने के लिए प्रेरित करने की शिकायतों को अलग से दर्ज किया जाता है? क्या कंपनियां यह पता लगाने की कोशिश करती हैं कि कोई चालक बार-बार महिला यात्रियों से निजी संपर्क स्थापित करने का प्रयास तो नहीं कर रहा? यदि ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है तो होनी चाहिए, क्योंकि आधुनिक तकनीक केवल सुविधा देने के लिए नहीं, संभावित जोखिमों को पहचानने के लिए भी इस्तेमाल की जा सकती है।
हमें यह भी समझना होगा कि महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर किसी पूरे समुदाय को अपराधी ठहराना समाधान नहीं है। यदि किसी चालक ने फर्जी ID का इस्तेमाल किया है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन केवल उसके नाम या धर्म के आधार पर उसे अपराधी मान लेना उचित नहीं है। यदि किसी व्यक्ति द्वारा किसी महिला का पीछा किया गया, निजी जानकारी हासिल करने का प्रयास किया गया, ऐप से बाहर निजी राइड के लिए दबाव बनाया गया या सुरक्षा व्यवस्था का दुरुपयोग किया गया तो उसके खिलाफ कार्रवाई उसके आचरण और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए। अपराधी का धर्म नहीं, उसका अपराध उसकी पहचान होना चाहिए। यही किसी सभ्य और कानूनसम्मत समाज का आधार है।
फिर भी उन लोगों से सवाल पूछना जरूरी है जो महिला सुरक्षा की समस्या को केवल तब गंभीरता से लेते हैं जब कोई बड़ी घटना घट जाती है। आखिर रोकथाम की व्यवस्था पहले क्यों नहीं बनाई जाती? कंपनियों को केवल यह नहीं बताना चाहिए कि शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाएगी। उन्हें यह भी बताना होगा कि ऐसी घटनाएं होने से पहले उन्हें रोकने के लिए क्या व्यवस्था है। यदि किसी चालक की ID ब्लॉक की गई है तो क्या उसका चेहरा, मोबाइल नंबर, दस्तावेज और अन्य पहचान संबंधी विवरण सिस्टम में इस प्रकार सुरक्षित किए जाते हैं कि वह किसी दूसरे व्यक्ति की ID का इस्तेमाल न कर सके? यदि कोई व्यक्ति बार-बार अलग-अलग IDs से सिस्टम में प्रवेश करता है तो क्या उसे पहचाना जाता है? यदि किसी महिला यात्री की ओर से गंभीर शिकायत आती है तो क्या केवल रेटिंग कम कर देना पर्याप्त माना जाएगा या वास्तविक जांच भी होगी?
प्रशासन की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। पुलिस और परिवहन विभाग को केवल घटना के बाद सक्रिय होने की बजाय ऐसी सेवाओं की सुरक्षा व्यवस्था का नियमित निरीक्षण करना चाहिए। ऐप आधारित बाइक टैक्सी और कैब सेवाओं में चालक की पहचान, वाहन का सत्यापन और लाइसेंस संबंधी नियमों का पालन कितना हो रहा है, इसकी समय-समय पर जांच होनी चाहिए। जिन चालकों की ID किसी कारण से बंद की गई है, उनके दूसरे व्यक्तियों की ID से दोबारा सेवा में आने की संभावना को रोकना भी कंपनियों और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
महिला सुरक्षा के लिए एक और व्यावहारिक कदम यह हो सकता है कि कंपनियां अधिक से अधिक महिला चालकों को इस क्षेत्र में रोजगार दें और महिला यात्रियों को, जहां संभव हो, महिला चालक चुनने का विकल्प उपलब्ध कराएं। इससे महिलाओं को रोजगार भी मिलेगा और उन यात्रियों को अतिरिक्त सुविधा भी मिलेगी जो महिला चालक के साथ अधिक सहज महसूस करती हैं। यह किसी पुरुष के विरुद्ध व्यवस्था नहीं होगी, बल्कि महिलाओं के लिए अतिरिक्त विकल्प और सुरक्षा का माध्यम होगी।
परिवारों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बेटियों को डराकर घर में बैठा देना सुरक्षा नहीं है। उन्हें स्वतंत्रता से वंचित कर देना भी समाधान नहीं है। उन्हें यह सिखाना होगा कि किसी अजनबी के साथ कितना और किस स्तर तक संवाद करना है, ऐप पर चालक की फोटो और वास्तविक चेहरे का मिलान कैसे करना है, वाहन नंबर कैसे देखना है, संदिग्ध स्थिति में राइड कैसे रद्द करनी है, लाइव लोकेशन परिवार के साथ कैसे साझा करनी है और किसी चालक के द्वारा निजी संपर्क बनाने के प्रयास को कैसे स्पष्ट रूप से अस्वीकार करना है। बच्चों को यह भी समझाना होगा कि किसी व्यक्ति का बार-बार मिलना उसे विश्वसनीय नहीं बना देता और किसी का सस्ता प्रस्ताव सुरक्षित होने की गारंटी नहीं है।
आज सोशल मीडिया के दौर में किसी भी घटना को कुछ ही मिनटों में किसी धर्म, जाति या समुदाय से जोड़कर प्रचारित करना आसान हो गया है। इसलिए समाज को एक तरफ अपराध के प्रति कठोर रहना होगा तो दूसरी तरफ प्रमाण और विवेक के प्रति भी ईमानदार रहना होगा। यदि कभी किसी मामले में संगठित षड्यंत्र या सुनियोजित नेटवर्क के प्रमाण सामने आते हैं तो उसकी निष्पक्ष और कठोर जांच होनी चाहिए। लेकिन बिना प्रमाण किसी पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा करना न न्याय है, न पत्रकारिता और न ही सामाजिक समाधान।
इसलिए “दिव्य रश्मि” का सवाल सीधा है—क्या हमारी ऐप आधारित परिवहन व्यवस्था महिलाओं की सुरक्षा के लिए पर्याप्त है? क्या कंपनियां केवल ग्राहक संख्या और राइड की संख्या गिन रही हैं या सुरक्षा को भी अपने व्यवसाय का अनिवार्य हिस्सा मान रही हैं? क्या चालक वही है जिसकी ID है? क्या वाहन वही है जो ऐप पर दर्ज है? क्या पहचान वास्तव में सत्यापित होती है? क्या किसी महिला यात्री को ऐप से बाहर निजी राइड के लिए प्रेरित करने वाले व्यवहार पर निगरानी होती है? क्या शिकायत के बाद केवल आश्वासन दिया जाता है या वास्तविक कार्रवाई भी होती है?
इन प्रश्नों का उत्तर अब केवल कंपनियों को नहीं, प्रशासन को भी देना चाहिए।
हम किसी कंपनी को बदनाम करने के पक्ष में नहीं हैं। हम किसी धर्म या समुदाय के विरुद्ध अभियान चलाने के पक्ष में भी नहीं हैं। लेकिन हम महिला सुरक्षा के प्रश्न पर चुप रहने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं। यदि व्यवस्था में छेद है तो उसे सामने लाना पत्रकारिता का दायित्व है। यदि किसी व्यक्ति ने फर्जी पहचान का इस्तेमाल किया है तो उसे उजागर करना जरूरी है। यदि कोई महिला यात्री को ऐप से बाहर निजी संबंध या निजी परिवहन के लिए प्रेरित करता है तो उसकी शिकायत को गंभीरता से लेना जरूरी है। और यदि कहीं किसी संगठित अपराध के प्रमाण मिलते हैं तो उसकी निष्पक्ष जांच और कठोर कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक है।
हमारी बेटियों को घर में बंद करना सुरक्षा नहीं है। उनकी स्वतंत्रता छीन लेना सुरक्षा नहीं है। वास्तविक सुरक्षा वह है जिसमें बेटी निर्भय होकर घर से निकले, अपने गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचे और उसी आत्मविश्वास के साथ घर लौटे।
इसलिए आवश्यकता डर फैलाने की नहीं, जागरूकता फैलाने की है। आवश्यकता किसी समुदाय से नफरत करने की नहीं, संदिग्ध व्यवहार के विरुद्ध आवाज उठाने की है। आवश्यकता अफवाहों की नहीं, प्रमाणों की है। आवश्यकता केवल शिकायत करने की नहीं, ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें शिकायत की नौबत ही कम से कम आए।
और अंततः एक बात बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए—नाम कोई भी हो, धर्म कोई भी हो, पहचान कोई भी हो, यदि कोई व्यक्ति महिला की सुरक्षा से खिलवाड़ करता है, फर्जी पहचान का इस्तेमाल करता है, पीछा करता है, धोखे से विश्वास हासिल करता है या कानून और व्यवस्था को चुनौती देता है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए।
अपराध का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन समाज की जिम्मेदारी जरूर होती है।
आज हमें अपनी बेटियों से केवल यह नहीं कहना है कि “सावधान रहना”, बल्कि उन्हें यह भी बताना है कि संदेह हो तो सवाल करो, पहचान न मिले तो राइड छोड़ दो, दबाव हो तो विरोध करो, खतरा लगे तो तुरंत मदद लो और किसी भी परिस्थिति में अपनी सुरक्षा से समझौता मत करो।
क्योंकि कुछ रुपये की बचत, कुछ मिनट की सुविधा या किसी अनजान व्यक्ति की मीठी बातों से अधिक मूल्यवान है—एक बेटी का सुरक्षित घर लौटना।
और यही वह सवाल है जिसे अब हर परिवहन कंपनी, हर प्रशासन और हर परिवार को गंभीरता से लेना होगा।
हमारी बेटियों की सुरक्षा केवल उनके परिवार की जिम्मेदारी नहीं है।
यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
डॉ राकेश दत्त मिश्र
संपादक
दिव्य रश्मि
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