वह लड़की चंद्र कला सी
कुमार महेंद्रशीतल समीर की छुअन सरीखी,
वह मंद-मंद मुस्काती है।
घिरते कजरारे मेघों संग,
वह अलकें खोल लजाती है।
तारागण भी झुक जाते हैं,
देख उसकी छवि चपला सी।
वह लड़की चंद्र कला सी।।
नेह-निर्झर-सा उसका आँचल,
जब-जब लहराए।
जैसे सदियों की प्यासी धरती,
सावन की पहली बूँदें पाए।
सागर की उठती लहरों पर,
वह चलती मृदु चंचला सी।
वह लड़की चंद्र कला सी।।
रग-रग में यौवन प्रस्फुटित,
नयनों में नेह अपार।
मृदुल-मधुर हाव-भाव लिए,
हर कदम झलके संस्कार।
रूप भरे अंतस में मधुरिमा,
लज्जा की किरण उज्ज्वला सी।
वह लड़की चंद्र कला सी।।
मेरी हृदय की धड़कन बनकर,
वह मुझमें ही बस जाती है।
मधुमास बन साँसों की माला में,
प्रणय-गीत सुनाती है।
शरद चंद्र की ज्योत्स्ना बनकर,
मन में उतरती मृदुला सी।
वह लड़की चंद्र कला सी।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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