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महिला सशक्तिकरण और बिहार की स्वर्णिम यात्रा

महिला सशक्तिकरण और बिहार की स्वर्णिम यात्रा

प्रवीण कुमार पाठक, ट्रेनिंग ऑफिसर , जिला जीविका औरंगाबाद
​2 अक्टूबर 2006 को जब बिहार की धरती पर 'जीविका' (बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति) का बीज बोया गया था, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यह पहल आगे चलकर राज्य के सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य को बदलकर रख देगी। आज 2 अक्टूबर 2026 को जीविका अपनी स्थापना के 20 गौरवशाली वर्ष पूरे कर रहा है। पिछले दो दशकों की यह यात्रा केवल एक सरकारी योजना की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह बिहार की ग्रामीण महिलाओं के अदम्य साहस, स्वावलंबन और नेतृत्व की बेमिसाल गाथा है।
​जीविका का सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि इसने ग्रामीण महिलाओं को घर की चारदीवारी से निकालकर स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से एक सशक्त पहचान दी। बचत और बैंकिंग की सामान्य समझ से शुरू हुआ यह सफर आज ग्राम संगठनों और संकुल स्तरीय संघों जैसे मजबूत सामुदायिक संस्थानों के रूप में वटवृक्ष बन चुका है। इन त्रिस्तरीय सामुदायिक संस्थाओं ने महिलाओं को केवल योजनाओं की 'लाभार्थी' बनाने के बजाय उन्हें 'निर्णयकर्ता' और 'नेतृत्वकर्ता' के रूप में स्थापित किया है। आज ग्रामीण बिहार की बहनें न केवल अपने परिवार के वित्तीय फैसले ले रही हैं, बल्कि गांव और समाज के विकास की दिशा भी तय कर रही हैं।
​आजीविका और वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में जीविका ने क्रांति ला दी है। परंपरागत कृषि और पशुपालन से आगे बढ़कर महिलाओं ने डेयरी, सिलाई, खाद्य प्रसंस्करण, मुर्गी पालन और स्थानीय उद्यमों में अपनी धाक जमाई है। जीविका दीदियों द्वारा संचालित 'दीदी की रसोई' जैसी पहलों ने न केवल अस्पतालों और संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण भोजन प्रदान किया, बल्कि महिलाओं को सफल उद्यमी के रूप में नई पहचान भी दी। बैंकों से सीधे जुड़ने और ऋण सुविधाओं के सुलभ होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था से साहूकारों का वर्चस्व समाप्त हुआ है और महिलाओं की निर्भरता खत्म हुई है।
​जीविका ने सरकारी योजनाओं, स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता और बैंकिंग सेवाओं को गांव के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने में एक मजबूत सेतु का काम किया है। डिजिटल साक्षरता के इस दौर में जीविका दीदियाँ बैंक मित्र और पशु सखी के रूप में गाँव-गाँव सेवाएँ दे रही हैं, जो इस बदलाव की जीवंत तस्वीर है।
​पिछले लगभग 18 वर्षों से इस ऐतिहासिक यात्रा का प्रत्यक्ष हिस्सा रहते हुए मुझे इस अभूतपूर्व परिवर्तन को बहुत करीब से देखने और महसूस करने का सौभाग्य मिला है। गाँव की जिन महिलाओं में कभी अपनी बात कहने का संकोच था, आज वही महिलाएँ मंचों से पूरी दुनिया के सामने अपनी सफलता की कहानी साझा करती हैं। उनके चेहरे का आत्मविश्वास और आर्थिक स्वावलंबन ही इस अभियान की सबसे बड़ी पूंजी है।
​संक्षेप में कहें तो, जीविका के 20 साल का यह सफर महिला शक्ति, सामुदायिक एकजुटता और 'आत्मनिर्भर बिहार' के सपने को साकार करने के दो बेमिसाल दशक हैं। इस पावन अवसर पर उन सभी जीविका दीदियों और कार्यकर्ताओं को नमन, जिन्होंने अपने संघर्ष और समर्पण से बिहार के ग्रामीण जीवन को समृद्ध और गौरवान्वित बनाया है।​
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