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गुलाबी नगरी में आकर, मैं भी हो गया गुलाब

गुलाबी नगरी में आकर, मैं भी हो गया गुलाब

कुमार महेंद्र
गुलाबी आभा में नहाई,
संध्या का सुंदर श्रृंगार।
मंद पवन में घुली सुगंध,
मोह रहा मन बारंबार।
दीवारों पर अंकित दिखती,
गौरवशाली इतिहास की छाप।
गुलाबी नगरी में आकर, मैं भी हो गया गुलाब।।


हवामहल के झरोखों से,
छनकर आई स्वर्णिम धूप।
जलमहल की शांत तरंगों ने,
बिखराया अपना मनहर रूप।
आमेर दुर्ग की ऊँची प्राचीर,
कहती वीरों का अनुपम प्रताप।
गुलाबी नगरी में आकर, मैं भी हो गया गुलाब।।


नाहरगढ़ की ऊँची चोटी से,
देखा नगरी का सुंदर रूप।
जंतर-मंतर के यंत्रों में,
दिखा ज्ञान-विज्ञान अनूप।
पत्थर-पत्थर में बोल रहा है,
शिल्प-कला का सौंदर्य भाव।
गुलाबी नगरी में आकर, मैं भी हो गया गुलाब।।


घेवर की मधुर सुगंध ने,
मन में घोली मधुर मिठास।
दाल-बाटी के स्वाद में जैसे,
बसता राजस्थान का उल्लास।
वीरभूमि की गौरव-गाथा,
उर में जगाती शौर्य का सैलाब।
गुलाबी नगरी में आकर, मैं भी हो गया गुलाब।।


रंग-बिरंगे परिधानों में,
झलके संस्कृति का श्रृंगार।
ढोल-नगाड़ों की थापों पर,
नाचे मनवा बारंबार।
लोकगीतों की मधुर तान से,
रग रग में उमड़ा उल्लास।
गुलाबी नगरी में आकर, मैं भी हो गया गुलाब।।


इस मिट्टी के निश्छल रंग में,
रंग गया मेरा मन भी आज।
सादगी, अपनत्व और प्रेम ने,
जीत लिया हृदय का हर राज।
लाख खोजता रहा जग में,
मिला न ऐसा शहर खास।
गुलाबी नगरी में आकर, मैं भी हो गया गुलाब।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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