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आरटीआई के खुलासे से विजयीपुर अंचल कार्यालय की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल, अभिलेखों की अनुपलब्धता ने बढ़ाया विवाद

आरटीआई के खुलासे से विजयीपुर अंचल कार्यालय की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल, अभिलेखों की अनुपलब्धता ने बढ़ाया विवाद

  • आरटीआई के खुलासे से विजयीपुर अंचल कार्यालय की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल, अभिलेखों की अनुपलब्धता ने बढ़ाया विवाद
  • विद्यालय की भूमि की मापी से लेकर निवास प्रमाणपत्र जारी करने के दस्तावेजों तक का मामला सवालों के घेरे में; जिला निगरानी कोषांग में लंबित है प्रकरण, जिम्मेदार अधिकारियों एवं कर्मचारियों को चिह्नित कर कानूनी कार्रवाई की मांग

विजयीपुर (गोपालगंज)। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मांगी गई सूचनाओं के जवाब में अभिलेख उपलब्ध नहीं होने की जानकारी दिए जाने से गोपालगंज जिले के विजयीपुर अंचल कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला विद्यालय की भूमि की मापी से संबंधित पुराने अभिलेखों तथा निवास प्रमाणपत्र जारी किए जाने की प्रक्रिया से जुड़ा है। शिकायतकर्ता सुरेश चंद पाण्डेय उर्फ त्यागी ने आरोप लगाया है कि अंचल कार्यालय द्वारा महत्वपूर्ण अभिलेखों की अनुपलब्धता बताकर मामले से संबंधित आवश्यक जानकारियां उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। उन्होंने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने, अभिलेखों की स्थिति स्पष्ट करने तथा यदि रिकॉर्ड गायब करने अथवा गलत जानकारी देने की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार व्यक्तियों को चिह्नित कर उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है। शिकायतकर्ता के अनुसार, यह मामला जिला निगरानी कोषांग, समाहरणालय, गोपालगंज में भी लंबित है।

प्राप्त विवरण के अनुसार, विवाद की शुरुआत श्री देवरहा बाबा शिक्षण संस्थान द्वारा स्थापित श्री देवरहा बाबा संस्कृत प्राथमिक सह उच्च विद्यालय, मठिया, अंचल विजयीपुर, जिला गोपालगंज की भूमि की मापी से संबंधित आवेदन से हुई। बताया गया है कि विद्यालय की भूमि मौजा पगरा, थाना नंबर-09, खाता नंबर-87, खेसरा नंबर-627, रकबा 0.38 डिसमिल/हेक्टेयर के विवरण वाली जमीन की मापी एवं पैमाइश कराने के लिए संस्थान की ओर से अंचल पदाधिकारी, विजयीपुर के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया गया था। आवेदन से संबंधित पत्र संख्या 06/07-08 दिनांक 31 दिसंबर 2008 बताई गई है।

शिकायतकर्ता का कहना है कि भूमि की मापी के लिए अंचल कार्यालय द्वारा शुल्क की मांग की गई थी। इसके बाद संस्थान के संस्थापक सुरेश चंद पाण्डेय उर्फ त्यागी ने 300 रुपये का मापी शुल्क जमा कराया। उनके द्वारा प्रस्तुत विवरण में रसीद संख्या U175830 तथा 22 जनवरी 2008 की तारीख का उल्लेख है। हालांकि, आवेदन और शुल्क जमा करने की तिथियों के क्रम में उपलब्ध विवरण में असंगति दिखाई देती है। इसलिए संबंधित मूल आवेदन, शुल्क रसीद और कार्यालयी पंजियों की जांच के बाद ही इस संबंध में वास्तविक समय-क्रम की पुष्टि हो सकती है।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि विद्यालय की भूमि की मापी से संबंधित प्रक्रिया के दौरान कथित रूप से अनियमितता बरती गई और योगेन्द्र नामक व्यक्ति के नाम पर जाली अभिलेख तैयार कर मापी कराने के लिए 6 दिसंबर 2007 को नोटिस जारी किया गया। उन्होंने इस कार्रवाई को धोखाधड़ीपूर्ण और गैरकानूनी बताते हुए संबंधित दस्तावेजों की जांच की मांग की है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि तथा कथित जाली अभिलेखों की वास्तविक स्थिति संबंधित मूल रिकॉर्ड की जांच और सक्षम प्राधिकारी के निष्कर्ष के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

आरटीआई के जवाब में अभिलेख उपलब्ध नहीं होने की जानकारी


इस प्रकरण में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का सहारा लेते हुए शिकायतकर्ता ने अंचल कार्यालय से मापी से संबंधित अभिलेखों और कार्रवाई की जानकारी मांगी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उन्होंने सूचना प्रपत्र 'क' के साथ 10 रुपये का भारतीय पोस्टल ऑर्डर संख्या 56F192819 संलग्न कर पंजीकृत डाक संख्या RF85689952IN के माध्यम से 26 अगस्त 2022 को लोक सूचना पदाधिकारी सह अंचल पदाधिकारी, विजयीपुर के कार्यालय को आवेदन भेजा था।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, अंचल कार्यालय विजयीपुर ने पत्र संख्या 1567, दिनांक 7 अक्टूबर 2023 के माध्यम से जवाब देते हुए बताया कि मापी से संबंधित अभिलेख कार्यालय में उपलब्ध नहीं हैं। इसी जवाब को लेकर शिकायतकर्ता ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि जब भूमि की मापी के लिए आवेदन और शुल्क जमा करने का दावा किया गया है तथा कथित तौर पर मापी की प्रक्रिया में नोटिस जारी किए जाने की बात सामने रखी गई है, तब संबंधित अभिलेखों का उपलब्ध नहीं होना गंभीर जांच का विषय है।

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि संबंधित मापी की प्रक्रिया वास्तव में कार्यालय के माध्यम से संचालित हुई थी, तो उसके आवेदन, शुल्क रसीद, नोटिस, आदेश-पत्र, मापी प्रतिवेदन और अन्य संबंधित दस्तावेजों की वर्तमान स्थिति क्या है? क्या ये अभिलेख कभी कार्यालय में दर्ज थे? यदि थे, तो वे अब उपलब्ध क्यों नहीं हैं? क्या उनका किसी अन्य कार्यालय में स्थानांतरण हुआ, उन्हें नियमानुसार नष्ट किया गया अथवा वे किसी अन्य कारण से अनुपलब्ध हैं? इन प्रश्नों का उत्तर संबंधित अभिलेखों, रिकॉर्ड रजिस्टरों और दस्तावेजों के संरक्षण संबंधी नियमों की जांच से ही मिल सकता है।

शिकायतकर्ता की मांग है कि इस संबंध में केवल अभिलेख उपलब्ध नहीं होने की सूचना देकर मामले को समाप्त न माना जाए, बल्कि अभिलेखों की खोज, रिकॉर्ड रजिस्टरों की जांच और संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका का निर्धारण किया जाए। यदि किसी स्तर पर जानबूझकर अभिलेख गायब करने, गलत जानकारी देने या किसी व्यक्ति को अनुचित लाभ पहुंचाने की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

निवास प्रमाणपत्र के अभिलेखों को लेकर भी विवाद


इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष निवास प्रमाणपत्र जारी किए जाने की प्रक्रिया से संबंधित है। शिकायतकर्ता ने बताया कि उन्होंने सूचना प्रपत्र 'क' के तहत 10 रुपये के भारतीय पोस्टल ऑर्डर संख्या 72F891103 को संलग्न कर पंजीकृत डाक संख्या EF714116382IN के माध्यम से 22 जून 2026 को अंचल कार्यालय विजयीपुर से निवास प्रमाणपत्र जारी किए जाने के संबंध में साक्ष्य सहित जानकारी मांगी थी।

उनके अनुसार, अंचल कार्यालय ने पत्र संख्या 1452, दिनांक 25 सितंबर 2026 के माध्यम से जवाब दिया। इस जवाब में निवास प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए बताया गया कि आरटीपीएस कार्यालय में निवास प्रमाणपत्र जारी किए जाने से संबंधित अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं। शिकायतकर्ता ने इस जवाब पर भी सवाल उठाते हुए कहा है कि जब प्रमाणपत्र जारी किए जाने और बाद में उसे निरस्त किए जाने की कार्रवाई का उल्लेख किया गया है, तो संबंधित प्रक्रिया के दस्तावेजों और निर्णयों का अभिलेखीय आधार स्पष्ट किया जाना चाहिए।

यहां जांच का प्रमुख बिंदु यह है कि संबंधित निवास प्रमाणपत्र किस आवेदन के आधार पर जारी किया गया था, उसकी जांच किस अधिकारी या कर्मचारी ने की थी, प्रमाणपत्र जारी करने का आदेश किस स्तर पर पारित हुआ था और उसे निरस्त करने की कार्रवाई किन दस्तावेजों एवं नियमों के आधार पर की गई। यदि प्रमाणपत्र जारी करने और उसे निरस्त करने की कार्रवाई के दस्तावेज उपलब्ध हैं, तो उनकी प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने तथा संबंधित रिकॉर्ड के संरक्षण की स्थिति स्पष्ट करने की आवश्यकता है।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि अंचल कार्यालय ने उन्हें उत्तर प्रदेश का मूल निवासी बताते हुए उनके निवास प्रमाणपत्र को निरस्त किए जाने का उल्लेख किया, लेकिन इस निष्कर्ष के समर्थन में मांगी गई साक्ष्य-आधारित जानकारी उपलब्ध नहीं कराई। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति के निवास संबंधी दावे पर आपत्ति थी, तो उस पर निर्णय लेने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया, जांच रिपोर्ट, आदेश और अन्य संबंधित दस्तावेजों को स्पष्ट किया जाना चाहिए था।

इस संदर्भ में यह भी ध्यान देने योग्य है कि निवास प्रमाणपत्र जारी करना और उसे निरस्त करना प्रशासनिक प्रक्रिया के विषय हैं। ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति की पात्रता, प्रस्तुत दस्तावेज, लागू नियम और सक्षम अधिकारी के आदेश महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए यह निर्धारित करने के लिए कि कार्रवाई नियमसम्मत थी अथवा उसमें कोई अनियमितता हुई, मूल दस्तावेजों और संबंधित आदेशों का परीक्षण आवश्यक है।

बिहार सरकार के प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप


सुरेश चंद पाण्डेय उर्फ त्यागी ने अपने पक्ष में बिहार सरकार के गजट संख्या पटना-61, दिनांक 9 मार्च 2011 के क्रमांक-10 तथा शासनादेश पत्र संख्या 11/आ०-2-आ० नी०-05/2010, दिनांक 8 मार्च 2011 के क्रमांक-10 का हवाला दिया है। उनका दावा है कि इन प्रावधानों में स्थायी एवं अस्थायी निवास प्रमाणपत्र जारी किए जाने की व्यवस्था का उल्लेख है और संबंधित प्रावधानों की अनदेखी कर उन्हें मूल निवासी नहीं होने के आधार पर प्रतिकूल कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि उनके मामले में लागू नियमों और प्रशासनिक प्रक्रिया का समुचित पालन नहीं किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि निवास प्रमाणपत्र निरस्त करने की कार्रवाई के आधार पर उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई हुई, जिससे उन्हें गंभीर नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि, संबंधित गजट और शासनादेश की सटीक प्रयोज्यता, प्रमाणपत्र जारी करने की परिस्थितियों तथा निरस्तीकरण के आधार का निष्पक्ष परीक्षण किए बिना किसी कार्रवाई को अंतिम रूप से गैरकानूनी घोषित नहीं किया जा सकता। इसीलिए शिकायतकर्ता द्वारा उठाए गए प्रश्नों की जांच मूल दस्तावेजों के आधार पर किए जाने की आवश्यकता है।

पटना उच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला, सेवा बहाली का दावा


सुरेश चंद पाण्डेय उर्फ त्यागी ने पत्रकारों को बताया कि निवास प्रमाणपत्र निरस्त किए जाने की कार्रवाई का प्रभाव उनकी सरकारी सेवा पर भी पड़ा था। उनके अनुसार, जिला शिक्षा पदाधिकारी, अरवल, बिहार के पत्र संख्या 1220, दिनांक 27 नवंबर 2019 के माध्यम से उन्हें सहायक शिक्षक के पद से बर्खास्त कर दिया गया था। शिकायतकर्ता का कहना है कि यह कार्रवाई उनके निवास प्रमाणपत्र को निरस्त किए जाने के आधार पर की गई थी।

उन्होंने पटना उच्च न्यायालय में दायर सीडब्ल्यूजेसी संख्या 1410/2020 में 25 सितंबर 2023 को पारित निर्णय का हवाला देते हुए दावा किया कि न्यायालय ने अंचल पदाधिकारी, विजयीपुर द्वारा निवास प्रमाणपत्र निरस्त किए जाने की कार्रवाई को अमान्य करार दिया और इसके बाद उनकी सेवा पुनः बहाल हुई।

यह दावा इस पूरे प्रकरण को और महत्वपूर्ण बनाता है, क्योंकि इसमें राजस्व प्रशासन की कार्रवाई, निवास प्रमाणपत्र की वैधता और एक शिक्षक की सेवा से जुड़े प्रश्न परस्पर जुड़े हुए हैं। हालांकि, न्यायालय के निर्णय में की गई सटीक टिप्पणियों, आदेश के दायरे और सेवा बहाली के संबंध में अंतिम स्थिति की पुष्टि संबंधित न्यायिक आदेश तथा विभागीय अभिलेखों से की जानी चाहिए।

यदि न्यायालय ने वास्तव में प्रमाणपत्र निरस्त करने की कार्रवाई को अमान्य ठहराया था, तो उस आदेश के अनुपालन और उससे संबंधित विभागीय प्रक्रिया का रिकॉर्ड भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि संबंधित अधिकारियों ने न्यायिक आदेश के बाद क्या कदम उठाए और वर्तमान में अभिलेखों की स्थिति क्या है।

जिला निगरानी कोषांग में लंबित मामले की निष्पक्ष जांच की मांग


शिकायतकर्ता के अनुसार, भूमि मापी और निवास प्रमाणपत्र से जुड़े आरोपों का मामला जिला निगरानी कोषांग, समाहरणालय, गोपालगंज में लंबित है। उन्होंने मांग की है कि इस मामले में उपलब्ध सभी दस्तावेजों को एकत्रित कर निष्पक्ष जांच की जाए तथा यह पता लगाया जाए कि अभिलेखों की अनुपलब्धता के पीछे वास्तविक कारण क्या है।

उनकी मांग है कि संबंधित आवेदन, शुल्क रसीद, नोटिस, भूमि मापी से जुड़े दस्तावेज, निवास प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया, प्रमाणपत्र निरस्त करने के आदेश, आरटीआई आवेदनों और उनके जवाबों की जांच की जाए। साथ ही, संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों से यह स्पष्ट कराया जाए कि जिन अभिलेखों के आधार पर प्रशासनिक कार्रवाई की गई, वे अब कार्यालय में उपलब्ध क्यों नहीं हैं।

यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी ने जानबूझकर अभिलेख नष्ट किए, उन्हें छिपाया, गलत सूचना दी अथवा नियमों के विपरीत कार्रवाई की, तो शिकायतकर्ता ने संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध लागू कानून के अनुसार विभागीय और कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है। उन्होंने यह भी आग्रह किया है कि मामले की जांच ऐसी निष्पक्ष एजेंसी अथवा सक्षम प्राधिकारी से कराई जाए, जिससे शिकायत के प्रत्येक पहलू की स्वतंत्र रूप से पड़ताल हो सके।

पारदर्शिता और जवाबदेही की कसौटी पर प्रशासन


सरकारी कार्यालयों में अभिलेखों का संरक्षण, उनका व्यवस्थित संधारण और नागरिकों को नियमानुसार सूचना उपलब्ध कराना प्रशासनिक जवाबदेही के महत्वपूर्ण आधार हैं। विशेष रूप से भूमि, राजस्व और निवास प्रमाणपत्र जैसे विषयों से संबंधित दस्तावेज नागरिकों के अधिकारों तथा उनके विरुद्ध या पक्ष में होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई के लिए निर्णायक महत्व रखते हैं।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाना और सार्वजनिक प्राधिकारों को जवाबदेह बनाना है। ऐसे में यदि किसी पुराने मामले के अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं, तो उनकी अनुपलब्धता का कारण स्पष्ट करना, रिकॉर्ड के रखरखाव की स्थिति की जांच करना और उपलब्ध वैकल्पिक दस्तावेजों के आधार पर तथ्य सामने लाना आवश्यक है। केवल अभिलेख उपलब्ध नहीं होने की सूचना से अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उन्हें जानबूझकर गायब किया गया है। लेकिन जब संबंधित दस्तावेजों के आधार पर पूर्व में कार्रवाई किए जाने का आरोप हो, तब उनकी अनुपलब्धता की गंभीर और निष्पक्ष जांच जरूरी हो जाती है।

विजयीपुर अंचल कार्यालय से जुड़े इस प्रकरण में अब मुख्य सवाल यही है कि भूमि मापी और निवास प्रमाणपत्र से संबंधित अभिलेखों की वास्तविक स्थिति क्या है, उन्हें खोजने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और शिकायतकर्ता को मांगी गई सूचनाओं के समर्थन में उपलब्ध दस्तावेज क्यों नहीं दिए गए। इन प्रश्नों का उत्तर संबंधित विभागीय रिकॉर्ड, निगरानी जांच और आवश्यक होने पर न्यायिक परीक्षण से ही सामने आ सकता है।

फिलहाल शिकायतकर्ता सुरेश चंद पाण्डेय उर्फ त्यागी ने पूरे मामले में निष्पक्ष जांच, अभिलेखों की उपलब्धता सुनिश्चित करने, जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान करने तथा दोष सिद्ध होने पर कानूनी कार्रवाई की मांग की है। अब यह संबंधित प्रशासनिक एवं निगरानी अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि शिकायत में उठाए गए बिंदुओं की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें, ताकि तथ्यों के आधार पर उचित निर्णय लिया जा सके और सरकारी कार्यालयों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता एवं जनविश्वास कायम रहे।नोट: इस समाचार में उल्लिखित अनियमितताओं, अभिलेखों की अनुपलब्धता और कथित गैरकानूनी कार्रवाई से संबंधित बातें शिकायतकर्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए विवरण एवं उनके आरोपों पर आधारित हैं। संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष और मूल अभिलेखों से स्वतंत्र पुष्टि प्राप्त होने पर मामले की स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।

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