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तुम्हारा यौवन कविता के छंद सा

तुम्हारा यौवन कविता के छंद सा

कुमार महेंद्र
रूप की मात्राएँ जैसे,
संतुलित होकर खड़ीं।
अलंकारों-सी सजी हैं,
लावण्य-लता की हर कड़ी।
अधरों पर बिखरा यौवन,
मधुरिम मकरंद सा।
तुम्हारा यौवन कविता के छंद सा।।


तुम्हारे मुख पर सजी यह,
मोहक-मधुर मुस्कान है।
काव्य की सुंदर विधा का,
जैसे पूर्ण विधान है।
नयनों में रस छलक रहा,
मन को मिले आनंद सा।
तुम्हारा यौवन कविता के छंद सा।।


गति में जैसे यति ठहरी,
चाल में मधुर ठहराव है।
तुम्हारी हर एक चितवन में,
गहन भावों का प्रभाव है।
उपमाएँ भी नत हो जाएँ,
रूप तुम्हारा मस्त मलंग सा।
तुम्हारा यौवन कविता के छंद सा।।


तुम आदि-काव्य की ऋचा हो,
रस का अनंत विस्तार हो।
मन पर बनकर मेघ बरसो,
प्रणय-भरा संचार हो।
विधाता की अनुपम रचना,
शाश्वत प्रेम-प्रबंध सा।
तुम्हारा यौवन कविता के छंद सा।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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