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"मुक्ति का अर्थ"

"मुक्ति का अर्थ"

पंकज शर्मा
प्रेम की लौ जब
भीतर नहीं जलती,
कर्तव्य की छाया
भारी होने लगती।
साथ रहता है फिर भी
साथ नहीं रहता—
दो देहों के बीच
एक मौन ठहरता है।


हाथ जुड़े रहते हैं,
मन छूटे रहते हैं;
शब्द बहुत होते हैं,
अर्थ रूठे रहते हैं।
रिश्ते की देहरी पर
मौन बैठ जाता है,
जिसे कोई कहता नहीं,
पर हर हृदय सुनता है।


संस्कारों की डोरी
सहसा नहीं टूटती;
लोक-लाज की गाँठें
सहज कहाँ छूटतीं।
मन रस्में ढोता है,
दिन वर्षों में ढलते—
बाहर दीप जलते हैं,
भीतर अँधेरे पलते हैं।


किसी की आँखों में
ठहरा हुआ क्षोभ पढ़ना,
बिना प्रश्न किए
उसका मौन समझना;
फिर अपने अधिकार से
एक पग पीछे हटना—
प्रेम का त्याग नहीं,
परिपक्वता है शायद।


प्रेम यदि निर्मल है,
तो कैद क्यों रचेगा?
जिसे हृदय ने चाहा,
उसे बंधन क्यों देगा?
वह बाँहों का घेरा नहीं,
खुला हुआ आकाश है;
प्रिय की स्वतंत्र साँस में
उसका विश्वास है।


हर गाँठ का खुलना
रिश्ते का अंत नहीं;
हर विदा के भीतर
विश्वास का क्षय नहीं।
कभी ढीला छोड़ देना
टूटने से बेहतर है—
कुछ दूरियाँ ही शायद
श्वास बचा लेती हैं।


संबंध का मूल्य केवल
उसके टिकने में नहीं;
जीवन की सार्थकता
साथ दिखने में नहीं।
जहाँ निकटता भी
मन को संकुचित करे,
वहाँ दूरी कभी-कभी
दर्पण बन जाती है।


और तब छोड़ देना
पराजय नहीं होता;
प्रेम स्वयं से ऊपर
उठकर मौन होता।
जिसे बाँधकर रखना
असंभव हो जाए—
उसे मुक्त कर देना
शायद प्रेम का
सबसे कठिन अर्थ है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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