Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

साँसों की आवृत्ति में, बस तुम्हारी ही स्मृति

साँसों की आवृत्ति में, बस तुम्हारी ही स्मृति

कुमार महेंद्र
धड़कन में तुम समाए हो,
साँसों की हर तरंग में।
जैसे घुलता रहे सोमरस,
पावन प्रेम के रंग में।
तुमसे ही आरंभ हुई चाहत,
तुमसे ही गूँजे प्रीत-स्तुति।
साँसों की आवृत्ति में, बस तुम्हारी ही स्मृति।।


नयनों के बंद झरोखों से,
तुम ही हर पल झाँकते हो।
मेरे सूने मन-आँगन में,
मधुमास के रंग भरते हो।
जब भी पुरवाई छूकर जाए,
जगा दे मन में मधुर प्रीति।
साँसों की आवृत्ति में, बस तुम्हारी ही स्मृति।।


दूरी चाहे जितनी हो,
तुम पास मेरे रहते हो।
मेरी रग-रग में तुम ही,
रक्त बनकर बहते हो।
मेरी मौन हुई भावनाओं को,
स्वर देती तुम्हारी अनुभूति।
साँसों की आवृत्ति में, बस तुम्हारी ही स्मृति।।


चंदा की शीतल किरणों में,
चेहरा तेरा ही दिखता है।
प्रेम-सुधा से भीगा मन यह,
नाम तुम्हारा ही लिखता है।
जहाँ देखता हूँ, तुम दिखते हो,
मन में जागे मृदुल अनुरक्ति।
साँसों की आवृत्ति में, बस तुम्हारी ही स्मृति।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ