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अभियंता, प्रगति के प्रणेता

अभियंता, प्रगति के प्रणेता

कुमार महेंद्र
सपनों को जो रूप दिलाते,
असंभव को करते संभव।
सृजनशीलता जिनकी शक्ति,
कर्मठता जिनका अनुपम वैभव।
शून्य से शिखर गढ़ते जाते,
दुर्गम पथ के वीर विजेता।
अभियंता, प्रगति के प्रणेता।।


नदियों पर सेतु बनाकर,
विकास-पथ प्रशस्त कराते।
धरती से अंबर तक जाकर,
नव-आयाम सदा रचाते।
नित नवीन आविष्कारों से,
बनते युग-निर्माण के सृजेता।
अभियंता, प्रगति के प्रणेता।।


संगणक की सूक्ष्म प्रणालियाँ,
नवयुग की राह सजातीं।
यंत्रों के हर कलपुर्जे में,
नवगति की धुन लातीं।
ज्ञान-कौशल के ध्वज वाहक,
नूतन युग के रचयिता।
अभियंता, प्रगति के प्रणेता।।


अंधकार को दूर भगाकर,
ज्ञान-ज्योति जगमगाते।
देश-विकास की पावन धारा,
जन-जन तक वे ले जाते।
भारत का गौरव बढ़ाते,
राष्ट्र-प्रगति के निर्माता।
अभियंता, प्रगति के प्रणेता।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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