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जलता हुआ दिया हूँ, मगर रोशनी नहीं

जलता हुआ दिया हूँ, मगर रोशनी नहीं


-डॉ. राकेश दत्त मिश्र

कभी-कभी जीवन हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है, जहाँ पीछे मुड़कर देखने पर स्मृतियाँ दिखाई देती हैं और आगे देखने पर केवल एक लंबा, अनजान रास्ता।

आज अपनी जिंदगी को देखता हूँ तो मन के भीतर से एक आवाज उठती है-

“जिंदा हूँ… मगर इस तरह की जिंदगी, जिंदगी नहीं।”

सांसें चल रही हैं।
धड़कन मौजूद है।
सुबह होती है, शाम होती है।
लोग मिलते हैं, बातें होती हैं, काम होते हैं, जिम्मेदारियाँ निभती हैं।

बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है।

लेकिन मन के भीतर?

वहाँ जैसे किसी ने समय को रोक दिया है।

वहाँ आज भी कुछ आवाजें गूंजती हैं।
कुछ चेहरे बार-बार सामने आते हैं।
कुछ बातें अधूरी रह गई हैं।
कुछ सपने अचानक अनाथ हो गए हैं।
और कुछ रास्ते ऐसे हैं, जिन पर अब अकेले चलना है।

शायद इसी अवस्था को शब्द देने की कोशिश में मन कह उठता है-

“मैं जलता हुआ दिया हूँ, मगर रोशनी नहीं।”

दिया बुझा नहीं है।

लौ अभी भी है।

वह जल रही है, काँप रही है, अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। लेकिन जिस उजाले के लिए वह कभी जला करती थी, वह उजाला जैसे कहीं खो गया है।

क्या यही जीवन है?

या जीवन का अर्थ केवल सांसों का चलते रहना नहीं, बल्कि किसी के लिए धड़कना, किसी का इंतजार करना, किसी के साथ भविष्य देखना और किसी की खुशी में अपनी खुशी तलाशना है?

शायद जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है कि मनुष्य अकेले पैदा होता है, लेकिन अकेले जीने के लिए पैदा नहीं होता।

उसे संबंध चाहिए।
उसे अपनापन चाहिए।
उसे संवाद चाहिए।
उसे किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जिसके सामने वह अपने भीतर की सारी थकान रख सके।

और जब वह व्यक्ति अचानक जीवन से चला जाता है, तो केवल एक रिश्ता समाप्त नहीं होता।

जीवन का एक पूरा अध्याय अचानक बंद हो जाता है।

फिर किताब हमारे हाथ में रहती है, लेकिन पढ़ने की इच्छा कहीं खो जाती है।

लोग समझाते हैं-“समय सब ठीक कर देगा।”

शायद समय कुछ घावों पर परत चढ़ा देता है।

लेकिन कुछ घाव ऐसे होते हैं जो ठीक नहीं होते। वे बस हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं। हम उन्हें लेकर चलना सीख जाते हैं।

दुनिया हमें मजबूत कहती है।

लेकिन दुनिया यह नहीं देख पाती कि मजबूत दिखाई देने वाला व्यक्ति रात के सन्नाटे में कितनी बार भीतर से टूटता है।

दिन में हम अपने चेहरे पर सामान्यता का आवरण डाल लेते हैं।

लेकिन रात?

रात किसी आवरण को स्वीकार नहीं करती।

रात में स्मृतियाँ अपने पूरे आकार के साथ सामने आती हैं।

वही आवाजें।
वही चेहरे।
वही स्थान।
वही अधूरी बातें।

और तब लगता है कि इंसान दुनिया से नहीं, अपने ही अतीत से लड़ रहा है।

सबसे विचित्र बात यह है कि मनुष्य अपने प्रिय को भूलना भी नहीं चाहता।

वह जानता है कि स्मृतियाँ उसे पीड़ा देती हैं, फिर भी उन्हीं स्मृतियों को सीने से लगाकर बैठा रहता है।

क्योंकि कभी-कभी दर्द ही उस व्यक्ति की आखिरी निशानी बन जाता है, जिसे हम खो चुके होते हैं।

इसलिए कुछ लोग अपने दुख से भी प्रेम करने लगते हैं।

क्योंकि उन्हें लगता है-

“अगर यह दर्द भी चला गया, तो शायद उसकी याद भी चली जाएगी।”

और तब आदमी अपने आँसुओं को रोकता नहीं।

उन्हें बहने देता है।

क्योंकि हर आँसू केवल कमजोरी नहीं होता।

कुछ आँसू प्रेम के प्रमाण होते हैं।

कुछ आँसू स्मृति के होते हैं।

और कुछ आँसू उस रिश्ते के होते हैं, जिसे मृत्यु भी समाप्त नहीं कर पाती।

क्या जीवन का अर्थ बदल सकता है?

शायद हाँ।

जीवन कभी एक जैसा नहीं रहता।

जिस चीज को हम कभी अपनी पूरी दुनिया समझते थे, उसके चले जाने के बाद हमें अपनी दुनिया को फिर से परिभाषित करना पड़ता है।

लेकिन यह आसान नहीं होता।

कभी लगता है-अब किसके लिए?

कभी लगता है-क्यों?

कभी लगता है-क्या आवश्यकता है?

और कभी मन बिल्कुल शांत होकर केवल इतना कहता है—

“अब बहुत हो गया…”

लेकिन शायद यहीं जीवन हमारी परीक्षा लेता है।

क्योंकि जिंदगी का अर्थ केवल सुख के दिनों में जीना नहीं है।

कभी-कभी जिंदगी का सबसे बड़ा साहस यही होता है कि मनुष्य अपने सबसे कठिन दिनों में भी अगली सुबह का इंतजार करे।

यह उम्मीद नहीं कि कल सब ठीक हो जाएगा।

बस इतनी उम्मीद कि-

कल शायद आज से थोड़ा अलग होगा।

जलता हुआ दिया

मैं अक्सर सोचता हूँ—दिया आखिर क्यों जलता है?

क्या उसे पता होता है कि उसकी लौ कितनी दूर तक जाएगी?

क्या उसे मालूम होता है कि उसकी रोशनी किसके काम आएगी?

नहीं।

वह बस जलता है।

शायद यही जीवन का दर्शन है।

हमें हमेशा यह जानना जरूरी नहीं कि हमारी जिंदगी का अंतिम परिणाम क्या होगा।

कभी-कभी हमें केवल अपना कर्तव्य निभाते हुए जलते रहना होता है।

भले ही आज रोशनी दिखाई न दे।

भले ही आसपास अंधेरा हो।

भले ही मन थक गया हो।

क्योंकि बुझ जाना आसान है, जलते रहना कठिन।

और शायद इसी कठिनाई का नाम जीवन है।

आज मैं स्वयं को उसी दिए की तरह देखता हूँ।

लौ है, लेकिन उजाला नहीं।
सांस है, लेकिन उत्साह नहीं।
दिन हैं, लेकिन उनमें पहले जैसी सुबह नहीं।
लोग हैं, लेकिन मन का संवाद कहीं खो गया है।

फिर भी एक बात मुझे रोकती है।

जिम्मेदारियाँ।

कुछ लोग।

कुछ अधूरे काम।

कुछ सपने।

कुछ ऐसे कार्य जिन्हें पूरा करना अभी बाकी है।

शायद ईश्वर ने अभी इसलिए सांसें जारी रखी हैं कि कहानी पूरी नहीं हुई है।

शायद जो चला गया, वह अपनी भूमिका पूरी कर गया।

और जो बचा है, उसे अपनी भूमिका निभानी है।

यह विचार आसान नहीं है।

लेकिन शायद स्वीकार करना ही आगे बढ़ने का पहला कदम है।

दुख के बाद मनुष्य वही नहीं रहता

हर बड़ा दुख मनुष्य को बदल देता है।

कुछ लोग कठोर हो जाते हैं।

कुछ मौन।

कुछ आध्यात्मिक।

कुछ भीतर से बहुत गहरे।

और कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपने दुख को समाज के लिए काम करने की शक्ति बना लेते हैं।

शायद मेरे सामने भी अब यही प्रश्न है-

क्या इस पीड़ा में ही डूबा रहूँ, या इसी पीड़ा को किसी उद्देश्य में बदल दूँ?

उत्तर आसान नहीं है।

लेकिन शायद जीवन हमें विकल्प देता ही इसलिए है कि हम अपने अंधेरे में स्वयं एक छोटी-सी मशाल तलाशें।

हो सकता है वह मशाल बहुत बड़ी न हो।

हो सकता है वह केवल एक विचार हो।

एक सेवा हो।

किसी जरूरतमंद की मदद हो।

किसी बच्चे की मुस्कान हो।

किसी अधूरे सपने को पूरा करने का प्रयास हो।

या केवल इतना कि हम अपने प्रिय की स्मृति को अपने कर्मों में जीवित रखें।

तब शायद मृत्यु अंत नहीं रह जाती।

वह स्मृति बन जाती है।

और स्मृति, यदि कर्म में बदल जाए, तो वह एक जीवित विरासत बन जाती है।

आज भी मन कहता है-

“मैं जलता हुआ दिया हूँ, मगर रोशनी नहीं।”

लेकिन शायद यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई।

क्योंकि जब तक लौ है, संभावना है।

जब तक सांस है, संभावना है।

जब तक मन में किसी के लिए प्रेम बचा है, संभावना है।

और जब तक संभावना है-

तब तक जीवन समाप्त नहीं हुआ।

शायद मुझे अभी जिंदगी से खुशी नहीं माँगनी चाहिए।

शायद मुझे अभी जिंदगी से उत्तर भी नहीं माँगना चाहिए।

फिलहाल इतना ही पर्याप्त है कि मैं इस लौ को बुझने न दूँ।

क्योंकि कौन जानता है-

आज जो लौ केवल मेरे भीतर जल रही है,

कल वही किसी और के अंधेरे रास्ते को रोशन कर दे।

और शायद उसी दिन मैं समझ पाऊँगा कि-

जिंदगी केवल वह नहीं जो हमारे साथ घटती है।
जिंदगी वह भी है जो हमारे टूटने के बाद हम अपने भीतर से फिर रचते हैं।

आज मैं थका हूँ।

आज मैं अकेला हूँ।

आज मेरे भीतर बहुत कुछ खाली है।

लेकिन मैं अभी भी यहाँ हूँ।

और शायद यही इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य है-

“मैं अभी भी यहाँ हूँ।”

एक दिन यह लौ फिर स्थिर होगी।

एक दिन शायद इस दिए से फिर रोशनी निकलेगी।

और उस दिन मैं अपनी आज की पीड़ा को देखकर शायद कह सकूँगा-

“मैं बुझा नहीं था…
मैं केवल बहुत देर तक अपने भीतर जलता रहा था।”

-डॉ. राकेश दत्त मिश्र
संपादक, दिव्य रश्मि
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