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अदीन अर्थात स्वावलंबी और स्वतंत्र जीवन जियो

अदीन अर्थात स्वावलंबी और स्वतंत्र जीवन जियो

डॉ राकेश कुमार आर्य
यजुर्वेद के 36 वें अध्याय का 24 वाँ मंत्र कर्मप्रधान, पुरुषार्थी और ऊर्जस्वित जीवन की यात्रा का सर्वश्रेष्ठ परिचायक है:-

‘ओ३म् तच्चक्षुर्देवहितम् पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम् शरद: शतं जीवेम् शरद: शतं श्रणुयाम् शरद: शतं प्रब्रवाम् शरद: शतमदीना: स्याम् शरद: शतं भूयश्च शरद: शतात्।।’
महर्षि दयानंद जी महाराज ने इस मंत्र को हमारे दैनिक संध्या में भी सम्मिलित किया है। महर्षि दयानन्द जी महाराज इस मंत्र को केवल दीर्घायु प्राप्त करने की कामना का मंत्र ही नहीं मानते बल्कि उनकी मान्यता है कि इस मंत्र को हमें पूर्ण ब्रह्मचर्य, शारीरिक आरोग्यता, मानसिक स्वाधीनता और सामाजिक उत्तरदायित्व का एक समग्र घोषणा पत्र माना जाना चाहिए।
ब्रह्मचर्य, शारीरिक आरोग्यता, मानसिक स्वाधीनता और सामाजिक उत्तरदायित्व का पवित्र भाव संपूर्ण मानवता के लिए हितकारी घोषणा पत्र है। आज संसार में सर्वत्र कोलाहल है। अधिकारों की मारामार है। रोग, शोक, मानसिक पराधीनता और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उपेक्षा पूर्ण दृष्टिकोण मनुष्य को खाता जा रहा है। मानवता सिमट रही है। इसलिए महर्षि दयानंद जी के इस प्रिय मंत्र की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है।
महर्षि दयानंद जी के अनुसार " वह परमात्मा, जो विद्वानों (देवों) का परम हितैषी है, जो सृष्टि के प्रारंभ से ही न्याय और सत्य के प्रकाश के साथ विद्यमान है, और जो ज्ञान का परम शुद्ध स्वरूप है। व्यावहारिक अर्थ में, यह ब्रह्मांड के भौतिक चक्षु 'सूर्य' और आध्यात्मिक चक्षु 'ज्ञान' दोनों का बोधक है।
हम सब सौ वर्षों (शरद ऋतुओं) तक अपनी आँखों की पूर्ण ज्योति के साथ संसार को देखते रहें।
हम रोगमुक्त होकर कम से कम सौ वर्षों तक कर्मठ जीवन जिएँ। हमारे कान सौ वर्ष तक सत्य उपदेश और कल्याणकारी ज्ञान सुनते रहें। हमारी वाणी सौ वर्ष तक सत्य, मधुर और विद्यायुक्त वचनों का प्रचार करती रहे। सबसे महत्वपूर्ण पद—हम सौ वर्ष तक किसी के अधीन या दीन-हीन (लाचार) न रहें, बल्कि पूर्णतः आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी बने रहें और यदि ईश्वर की कृपा और हमारे पुरुषार्थ से आयु सौ वर्ष से भी अधिक हो, तो वह अतिरिक्त समय भी इसी प्रकार स्वस्थ, ज्ञानयुक्त और स्वाधीन होकर बीते।"
इस मंत्र में ऋषि ने सौ शरद ऋतुओं की बात की है। सौ शरद ऋतुओं की ही बात क्यों की गई, यह बात विचार करने योग्य है ? बात स्पष्ट है कि शरद ऋतु के काल में ही अनेक प्रकार के रोग समाज में फैलते हैं। यदि शरद ऋतु के समय फैलने वाले उन रोगों को व्यक्ति झेल जाता है तो फिर लगभग एक वर्ष का स्वास्थ्य बीमा उसका बढ़ जाता है। इन सौ शरद ऋतुओं को प्राप्त करने में ब्रह्मचर्य की शक्ति बहुत महत्वपूर्ण काम करती है। बिना इंद्रिय संयम के दीर्घायु को प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने आयुर्वेद की खोज की। आंखों की देखने की शक्ति कानों से सुनने की शक्ति और अंग पतंग का स्वस्थ रहना तभी संभव है जब मनुष्य संयमित आहार-विहार रखे और वीर्य रक्षा (ब्रह्मचर्य) के द्वारा अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ बनाए।
वेद के किसी भी मंत्र का केवल अर्थ कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। केवल अर्थ कर लेने मात्र से तो हम उस मंत्र का एक पक्ष ही देख पाते हैं। वास्तव में अर्थ के बाद मनन और मनन के बाद निदिध्यासन बहुत आवश्यक है। मनन में एक ही मंत्र के अनेक अर्थ निकलकर आते हैं। मनन की इस प्रक्रिया में हमारी अनेक मानसिक शक्तियों का विकास होता है। उनको खुलकर खिलने अर्थात मुखरित होने का अवसर मिलता है।
मंत्र की अलग-अलग और ऊंची से ऊंची भूमियों से हमारा परिचय होता जाता है।
इस मंत्र की शक्ति पर भी विचार कीजिए। प्रथम दृष्टि या तो ऐसा लगता है कि जैसे हम अपनी इंद्रियों की देखने सुनने आदि की शक्ति को निरंतर बनाए रखने की प्रार्थना परमपिता परमेश्वर से कर रहे हैं परंतु यह शक्ति तभी स्थाई रूप से रह सकती है जब हम उसकी सुरक्षा के लिए स्वयं भी तत्पर होंगे। हमारी यह तत्परता स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने की हमारी प्राथमिकता को इंगित करती है। हम अपने अंग प्रत्यंग का ध्यान रखें। उसकी शक्तियों का विकास करते रहें। उसकी शक्तियों में कभी भी क्षरण न होने पाए, इस बात का ध्यान रखें। महर्षि दयानंद जी महाराज इस मंत्र के बारे में हमें बताते हैं कि यह मंत्र हमें स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने की प्रेरणा देता है।


मानसिक और बौद्धिक सक्रियता


मंत्र में प्रयुक्त 'श्रणुयाम् ' और 'प्रब्रवाम् ' अर्थात सुनें और बोलें को केवल भौतिक क्रिया ही नहीं समझना चाहिए। उनके पीछे भी एक मनोविज्ञान काम कर रहा है। वेद के ऋषि की मान्यता है कि मनुष्य एक सौ वर्ष तक बौद्धिक रूप से सक्रिय रहना चाहिए। उसकी कोई भी इंद्रिय शिथिल नहीं होनी चाहिए। उसकी मनन शक्ति भी सक्रिय रहनी चाहिए।
मनुष्य निरंतर वेद-विद्या और सत्य ज्ञान को सुनता रहे, स्वाध्याय करता रहे और सत्संग भी करता रहे। उसका गहन चिंतन मंथन निरंतर जारी रहे। महर्षि दयानंद जी कहते हैं कि वेद का पढ़ना और पढ़ाना सुनना और सुनाना आर्यों का परम धर्म है। बात स्पष्ट है कि वेद को पढ़ना तो है ही दूसरों को पढ़ाना भी है और जो पढ़ नहीं सकते दूसरों को पढ़ा नहीं सकते , वे सुनें और दूसरों को सुनाएं। सुने हुए को भी अपने पास नहीं रखना बल्कि उसे भी बांट देना है। इसका एक अभिप्राय यह भी हुआ कि संसार में रहकर जो कुछ भी प्राप्त किया ,वह संसार के लिए कल्याण के लिए लगा दिया। यह तभी संभव है जब हमारी मानसिक शक्तियां काम करती रहेंगी। सोचने समझने की शक्ति काम करती रहेगी अर्थात हम स्वस्थ अनुभव करेंगे। प्रवचन और शिक्षा दोनों अपने पास रखने की वस्तु नहीं हैं। इनको जितना अधिक बांटा जाता है उतना ही इनके कोष में वृद्धि होती है। संस्कृत के नितीकार का वचन है कि :-


न चौरहार्यं न च राजहार्यं न च भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥


अर्थात ' विद्या को न तो चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है। न भाइयों के बीच इसका विभाजन हो सकता है और न ही यह वजन में भारी होती है।इसे खर्च करने (बांटने) पर यह नित्य प्रति बढ़ती है।इसलिए विद्या रूपी धन सभी धनों में सबसे प्रधान (श्रेष्ठ) है। "
इसी भाव के दृष्टिगत हमारी आश्रम व्यवस्था में चौथा आश्रम संन्यास आश्रम कहलाता है। जिसमें व्यक्ति जीवन भर के संचित सामान को समाज के लिए बांट देता है। भौतिक धन को वह पुत्र पौत्रादिक में विभाजित कर देता है। राजा अपने राज्य को अपने योग्य उत्तराधिकारी को सौंप देता है और जो विद्याध्ययन करके ज्ञानार्जन किया है ,उसे भी हमारे पूर्वज संसार को बांटने के लिए निकल जाते थे। यह बहुत अच्छी परंपरा थी। इसी मंत्र की विस्तृत व्याख्या में यदि जाएंगे तो स्पष्ट पता चलता है कि बांटना हमारा एक मौलिक संस्कार है। हमने निष्क्रिय अथवा निकम्मा जीवन जीने वाले न हों बल्कि सक्रियता के साथ काम करने वाले बने रहें।अंतिम क्षण तक हमारे शरीर में ऊर्जा काम करती रहे।


अदीनता: पूर्ण स्वावलंबन और स्वतंत्रता


अदीनता जीवन के लिए बहुत आवश्यक है। मंत्र कह रहा है कि हम अदीन बनकर जीवन जीने के अभ्यासी हों। किसी के सामने हाथ फैलाने वाले न हों। हम स्वावलंबी हों, स्वाभिमानी हों, खुद्दार हों खुदगर्ज नहीं। जिस जीवन में स्वावलंबन और स्वाभिमानता का भाव होता है, वही जीवन वास्तव में अदीन जीवन होता है। यह पशु प्रवृत्ति है कि आप खाने के लिए अपना स्वाभिमान बेच दें। किसी उर्दू के शायर में बहुत अच्छी बात कही है:-


मिले खुश्क रोटी जो आजाद रहकर।
गुलामी के हलवे से है लाख बेहतर।।


मिर्जा गालिब ने बड़ा अच्छा कहा है:-


दिल का जख्म कभी दिखाया नहीं जाता।
गम का किस्सा हर बार सुनाया नहीं जाता।।


ध्यान रहे कि गम का किस्सा यदि बार-बार सुनने को बैठोगे तो स्वाभिमान खो बैठोगे।


इसी संदर्भ में संस्कृत का कवि लिखता है :-


रे रे चातक ! सावधानमनसा मित्र ! क्षणं श्रूयताम्
अम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः।
केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः॥


कभी चातक पर डालकर बड़ी पते की बात कह रहा है कि:- हे मित्र चातक! सावधान मन से एक क्षण के लिए मेरी बात सुनो। आकाश में बहुत से बादल होते हैं, लेकिन सभी बादल एक जैसे नहीं होते। कुछ बादल वर्षा करके धरती को भिगो देते हैं (लाभ पहुँचाते हैं), और कुछ बादल केवल व्यर्थ में गरजते रहते हैं। इसलिए तुम आकाश में जिस-जिस बादल को देखते हो, हर एक के सामने अपने दीन (याचना भरे) वचन मत कहो।'
संसार में मिलने वाला हर व्यक्ति आपकी समस्या का समाधान नहीं कर सकता। हर किसी के पास हर किसी की समस्या का समाधान होता भी नहीं है। इसलिए हर व्यक्ति के सामने अपने दिल का दर्द सुनाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। हर कोई व्यक्ति चिकित्सक नहीं होता। इसलिए हर किसी को अपना रोग नहीं बताना चाहिए। रोग का उपचार चिकित्सक ही करेगा । इसलिए योग्य चिकित्सक के पास ही जाना चाहिए और उसको ही अपना दर्द सुनाना चाहिए।


रोना हर किसी के आगे भी अपराध जगत में बतलाया,
खुद्दार वही मानव जग में नहीं तनिक दुख में घबराया।
जिसने खुद्दारी की खातिर नीलाम नहीं सम्मान किया,
सफल रहा बस जीवन उसका जिसने मान कमाया।।


ऋषि दयानन्द के राष्ट्र-दर्शन में जब तक ऐसा नहीं हो जाता है तब तक समझो कि दीनता समाप्त नहीं हुई। हमें स्वाभिमान प्रिय होना चाहिए, अभिमान नहीं। परावलंबन दुख का कारण होता है। छोटी से छोटी चिड़िया भी अपना स्वतंत्र घोंसला बनाकर रहती है अर्थात स्वावलंबी जीवन और स्वतंत्रता उसे भी प्रिय है। उनसे भी छोटी एक चींटी होती है। वह भी अपने पूरे झुंड के साथ अनुशासन में रहते हुए आत्मसम्मान की रक्षा करने में कुशल होती है। जिसका आत्मसम्मान या आत्मस्वाभिमान मर जाता है वह संसार में जीवित लाश के रूप में जीवन यापन करता है।


मत जीवन का अपमान करो
कभी न मन में अभिमान करो
जीवन जगत दो दिन का मेला
इसका भी कुछ ध्यान करो।।


महर्षि दयानंद जी महाराज का मानना था कि कोई भी व्यक्ति या राष्ट्र तब तक उन्नति नहीं कर सकता जब तक वह दूसरों पर आश्रित है अर्थात जब तक राजनीतिक सत्ता अपने किसी व्यक्ति के हाथ में नहीं आ जाएगी, तब तक राष्ट्र की रक्षा सुरक्षा संभव नहीं है राष्ट्र की रक्षा तभी संभव है जब राष्ट्र के लोग स्वाभिमानी हों। उन्हें अपने राष्ट्र की स्वाधीनता प्राणों से भी प्रिय हो। राष्ट्र की स्वाधीनता का अभिप्राय है प्रत्येक नागरिक के लिए ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करना जिनमें रहते हुए उन सबको अपनी निजता सुरक्षित दिखाई दे और उस निजता में रहते हुए वे अपना आत्मिक, शारीरिक, मानसिक , बौद्धिक और जागतिक कल्याण कर सकें। इसलिए प्रत्येक राष्ट्रवासी के लिए अदीन होकर जीवन जीना बहुत आवश्यक है।
यदि कोई राष्ट्र आर्थिक राजनीतिक रूप से किसी दूसरे देश का गुलाम है तो उसके लिए ऐसी स्थिति लज्जाजनक है। वेद इस प्रकार की स्थिति को राष्ट्रवासियों के लिए एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत करता है और लोगों से अपेक्षा करता है कि वह निजी स्वतंत्रता से लेकर राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले हों। क्योंकि दासता की स्थिति राष्ट्रवासियों को दीनता की स्थिति में धकेल देती है। स्वामी जी ने इस मंत्र के माध्यम से देशवासियों में स्वदेशी, स्वावलंबन और 'स्वराज' की भावना का बीजारोपण किया। लोगों को स्वदेशी, स्वावलंबन और स्वराज की पवित्र भावना से जोड़कर इनके महत्व को स्पष्ट किया। उनके अनुसार, सच्ची अदीनता वही है जहाँ मनुष्य पुरुषार्थ के बल पर अपनी आजीविका कमाए और सम्मानपूर्वक जिए।


आशावाद और असीमित पुरुषार्थ


वेद का एक भी मंत्र या उसकी एक भी सूक्ति अथवा एक भी शब्द ऐसा नहीं है जो मनुष्य को निराशावाद की ओर लेकर चले । वेद मानव मात्र के भीतर आशावाद का संचार करता है और सकारात्मक ऊर्जा से भरा हुआ है। इस मंत्र में 'भूयश्च शरदः शतात्' मानव को निराशा से दूर कर परम आशावाद की ओर ले जाता है। वेद की यह अनूठी विशेषता है कि वह कॉमेडी अथवा ट्रेजेडी पर अपने किसी भी विषय को समाप्त नहीं करता। कॉमेडी और ट्रेजेडी में हमको पश्चिम का चिंतन उलझाता है। कॉमेडी हास्य विनोद है, जिसमें अश्लीलता भी हो सकती है और ट्रेजेडी तो है ही त्रासदी अथवा दुख का कारण। इन दोनों के अलग वेद हमें सकारात्मकता की ऊंचाई पर ले जाकर प्रसन्नता की अनुभूति करता है। सकारात्मकता का अभिप्राय है कि उस ऊंचाई पर जाकर आपको अपना मार्ग अपने आप दीखने लगता है और मार्ग भी ऐसा जिस पर चलने से आपको आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है। किसी प्रकार का संशय नहीं रहता। किसी प्रकार का संदेह नहीं रहता। किसी प्रकार की शंका नहीं रहती।
गीता में कहां गया है कि :-


भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥


अर्थ: " जब उस परात्पर परब्रह्म (जो कारण और कार्य दोनों रूप में आद्य है) का साक्षात्कार हो जाता है, तब:
हृदय की अज्ञान रूपी ग्रंथि [भेदित] (छिन्न-भिन्न) हो जाती है।मनुष्य के मन के सारे संशय [मिट] जाते हैं।उसके समस्त [कर्मों] का क्षय (नाश) हो जाता है।"
इसी स्थिति को प्राप्त करना मानव जीवन का ध्येय है। वेद मानव को उसके ध्येय के प्रति समर्पित करता है और न केवल समर्पित करता है बल्कि उसमें अपना पूर्ण सहयोग, समर्थन और मार्गदर्शन भी देता है। वेद बिल्कुल वैसे ही हमारा ध्यान रखना है जैसे माता अपने बच्चों का रखती है। इसीलिए वेद को वेदमाता कहा गया है। जिन लोगों ने जगत को मिथ्या मानकर कर्महीनता को अपना दुर्भाग्य बना लिया था स्वामी जी ने उनकी उस अकर्मण्यता को लताड़ा। जिन लोगों ने संसार में आकर बाल बच्चों को पालना, उनके ब्याह शादी कर देने तक जीवन की परिभाषा को समेट दिया था और इतने में ही संतुष्ट रहकर अपने चलने की तैयारी करने लगते थे, उनकी इस प्रकार की सोच को स्वामीजी ने मानवता के विरुद्ध बताया। उन्होंने लोगों को लंबी आयु जीने के लिए इस मंत्र के माध्यम से प्रेरित किया और समझाया कि लंबी आयु को वरदान में बदल दो। इसलिए समाज और राष्ट्र के साथ-साथ आत्म कल्याण के लिए भी समय निकालो।


'स्व ' के स्थान पर ' पर ' को वरीयता दो

" जब हमारी प्रार्थना निष्कपट, सरल और पवित्र होती है तो हमारी प्रार्थना में ‘स्व’ के स्थान पर ‘पर’ कल्याण की कामनाएं बलवती हो उठती हैं। जब व्यक्ति ऐसी कामनाओं और प्रार्थनाओं के वशीभूत होकर कार्य करने लगता है तब वह ‘राष्ट्रीय’ हो जाता है। राष्ट्रीय होने का अभिप्राय किसी प्रकार से राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो जाना नही है, अपितु राष्ट्रीय होने का अर्थ है सर्वमंगल कामनाओं से भर जाना और सर्वोत्थान के लिए कार्य करना। अपनी सोच में या अपनी भावना में या अपनी कृति में किसी जाति को, किसी संप्रदाय को या किसी क्षेत्र विशेष को प्राथमिकता न देना ही राष्ट्रीय हो जाना है। यदि राष्ट्रीय स्तर पर किसी की प्रसिद्घि हो जाना ही राष्ट्रीय होने का प्रमाण होती तो ऐसे बहुत से डकैत, अपराधी या आतंकी हो गये हैं या वर्तमान में हैं जिन्हें देश ही नही विश्व भी जानता है, पर उन्हें कोई राष्ट्रीय नही कहता। यहां तक कि उन्हें कोई सामाजिक भी नही कहता। इसके विपरीत उन्हें या तो राष्ट्रद्रोही कहा जाता है या समाजद्रोही कहा जाता है। कारण कि उनकी भावना पवित्र नही है, उनकी भावना में नीचता है, निम्नता है, वह यज्ञरूप प्रभो के उपासक नही हैं। वह यज्ञरूप प्रभो के याज्ञिक स्वरूप को नही ध्याते, न ही भजते और न ही जपते।
हमारे यहां अश्वमेध यज्ञ की परंपरा इसीलिए रही है कि व्यक्ति जब राष्ट्र, जाति और देश के लिए अपने आप से राष्ट्र को महान समझकर राष्ट्रहित में सर्वस्व समर्पण की भावना से भर जाए, ओत-प्रोत हो जाए तब वह अश्वमेध यज्ञ करने का पात्र बनता है। इसी लिए कहा गया है-‘‘राष्ट्रं वै अश्वमेध:’’ इस प्रकार राष्ट्रीय होने का अभिप्राय है याज्ञिक होना और याज्ञिक होने का अर्थ है-यज्ञरूप प्रभु का उपासक होना। जैसे उस परमपिता-परमेश्वर के सारे भण्डार इस विशाल जगत के लिए हैं, इसके प्राणधारियों के लिए हैं, वैसे ही राष्ट्रीय व्यक्ति के पास या किसी यज्ञ पुरूष के पास जो कुछ भी होता है वह राष्ट्र के लिए होता है। भारत में कितने ही सम्राट हो गये हैं, जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ किये और अपना सर्वस्व राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया।
इस प्रकार हमारे पूर्वजों ने यज्ञ को राष्ट्रीय बनाकर जीवन जिया। यज्ञ के अनुरूप अपनी भावनाएं बनायीं और अपने पास अपना कुछ न समझकर जो कुछ भी था उसे लोककल्याण के लिए समर्पित कर दिया। इसका कारण यही था कि हम यज्ञमय थे और अपना सर्वस्व प्राणिमात्र के लिए होम करने वाले प्रभो के उपासक थे। जैसा हमारा प्रभु था, या दाता था वैसी ही हमारी भावनाएं थीं। यह था हमारे यज्ञ का आधार और यह थी हमारी प्रार्थना की ऊंचाई।
उपरोक्त मंत्र में भक्त कह रहा है कि हे स्वप्रकाश स्वरूप प्रकाशमान सर्वेश्वर! आप सब के दृष्टा सब को देखने वाले और जानने वाले देवों के परमहित कारक तथा पथ प्रदर्शक हैं। सृष्टि से पूर्व वर्तमान तथा प्रलय के अनंतर भी वर्तमान रहने वाले विज्ञान स्वरूप आप अनादि रूप से सब कालों में विद्यमान हैं। प्राणिमात्र को ऊपर उठाने वाली तथा उनकी उन्नति में सहायक शक्तियों को बीज रूप में आपने स्वकृपा से, सबको प्रदान कर रखा है।
हे प्रभु ऐसी कृपा करो, कि आपके सहाय व स्व पुरूषार्थ से हम इन शक्तियों का जीवन पर्यन्त सदुपयोग करते रहें। आपकी ही कृपा से हम आपके आनंदमय स्वरूप का ध्यान शतायु पर्यंत करते रहें। हमारी देखने, परखने, अनुभव करने तथा ज्ञान वर्धन करने वाली समस्त शक्तियां निरंतर विकसित होती रहें, अपने जीवन को हम सौ वर्षों तक जीवंत अर्थात कार्यकुशल बनाये रखें। कानों से और वाणी से आप ही का वेद ज्ञान हम सौ वर्ष पर्यंत सुनें तथा सुनाते रहें। आपकी ही सामीप्यता हर समय अनुभव करते हुए सौ वर्ष तक अदीनतापूर्वक जीवनयापन हम करते रहें। कभी भी किसी के पराधीन न हों। आपकी कृपा से यदि सौ वर्ष से भी अधिक आयु हमको प्राप्त हो तो भी हम आपकी छत्र छाया में ही स्वाधीनता पूर्वक विचरें। आपके दर्शन में मग्न हमारी आत्मा सदा (शांत) रहे यही हमारी आपसे बारंबार प्रार्थना है।



( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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