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मैं सनातन, सनातन, सनातन हूँ

मैं सनातन, सनातन, सनातन हूँ

कुमार महेंद्र
मैं समय की सीमा से परे,
एक अनंत गान हूँ।
मैं आदि हूँ, मैं अंत हूँ,
मैं सृष्टि का विधान हूँ।
मैं अजर, अमर, अविनाशी,
चिर-सत्य का मधुर वादन हूँ।
मैं सनातन, सनातन, सनातन हूँ।।


धरा की धूल से लेकर,
अंबर के विस्तार तक।
वेदों की पुनीत ऋचाओं से,
शंखों की झंकार तक।
प्रकृति-धर्म के हर पथ पर,
विजय-श्री संकल्प पावन हूँ।
मैं सनातन, सनातन, सनातन हूँ।।


मैं त्याग की पराकाष्ठा,
मैं तप का ओज प्रखर हूँ।
जो न्याय-पथ पर अड़ जाए,
उसका साहस शौर्य मुखर हूं ।
इतिहास के हर पृष्ठ पर,
अदम्य पराक्रम का दर्पण हूँ।
मैं सनातन, सनातन, सनातन हूँ।।


न अग्नि मुझे जला सके,
न शस्त्र मुझे काट सके।
न द्वेष का कोई अंधकार,
मेरी ज्योति को बाँट सके।
मैं चेतना का सिंधु हूँ,
मैं ज्ञान का आचमन हूँ।
मैं सनातन, सनातन, सनातन हूँ।।


संस्कृति की निर्मल गंगा,
संस्कारों का सागर हूँ।
मानवता का परम उपासक,
स्नेह-प्रेम का गागर हूँ।
सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् का,
शाश्वत मंगल-सिंहासन हूँ।
मैं सनातन, सनातन, सनातन हूँ।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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