भगवान श्रीकृष्ण का अनादर रोकें, भक्ति के नाम पर पाखंड न अपनाएँ

-डॉ. राकेश दत्त मिश्र
भारत की सनातन संस्कृति केवल पर्व-त्योहारों, पूजा-पद्धतियों और धार्मिक अनुष्ठानों की संस्कृति नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों की तपस्या, साधना, ज्ञान, त्याग, संस्कार और जीवन-मूल्यों से निर्मित एक विराट सभ्यता है। इस सभ्यता की आत्मा उसके देवी-देवताओं, ऋषियों, मुनियों, महापुरुषों और धर्मग्रंथों में निवास करती है। हमारे लिए भगवान श्रीराम केवल एक आराध्य नहीं, मर्यादा के प्रतीक हैं; भगवान शिव केवल देवाधिदेव नहीं, तप, त्याग और वैराग्य के प्रतीक हैं; माता दुर्गा केवल शक्ति का स्वरूप नहीं, बल्कि अधर्म के विरुद्ध नारी शक्ति की सनातन चेतना हैं और भगवान श्रीकृष्ण केवल जन्माष्टमी के दिन सजाई जाने वाली झांकी के बाल गोपाल नहीं, बल्कि धर्म, कर्म, ज्ञान, नीति, प्रेम, करुणा और जीवन-संघर्ष के सनातन मार्गदर्शक हैं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा केवल मंदिर की चारदीवारी अथवा किसी एक पर्व तक सीमित विषय नहीं हो सकती। कृष्ण करोड़ों लोगों की आस्था हैं, करोड़ों परिवारों की भावनाओं में बसे हैं और भारतीय संस्कृति के उस विराट दर्शन के प्रतिनिधि हैं, जिसने मनुष्य को जीवन के संघर्षों के बीच कर्तव्य, सत्य और धर्म का मार्ग दिखाया है। जब हम जन्माष्टमी मनाते हैं, तब वास्तव में हम केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं मनाते, बल्कि उस दिव्य चेतना का स्मरण करते हैं जिसने अधर्म, अत्याचार और निराशा से घिरे समाज में धर्म और आशा का प्रकाश फैलाया था।
कंस के अत्याचार से पीड़ित समाज में श्रीकृष्ण का अवतरण केवल एक बालक का जन्म नहीं था। वह अन्याय के अंधकार के बीच धर्म के प्रकाश का उदय था। वह भय के वातावरण में साहस का जन्म था। वह निराशा के बीच आशा का संदेश था। इसलिए जन्माष्टमी का पर्व आज भी हमारे लिए अत्यंत प्रासंगिक है। जब समाज में अन्याय दिखाई दे, जब व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख होने लगे, जब मोह और भ्रम उसके विवेक को ढकने लगे, जब शक्ति का अहंकार सत्य को दबाने का प्रयास करे, तब श्रीकृष्ण का जीवन और श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश हमें दिशा देता है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को पलायन का मार्ग नहीं दिखाया, उन्होंने उसे उसके कर्तव्य का बोध कराया। उन्होंने उसे मोह और भ्रम से बाहर निकाला और धर्मसम्मत कर्म करने की प्रेरणा दी। इसलिए आज जब हम जन्माष्टमी की तैयारी कर रहे हैं, तब हमें स्वयं से यह प्रश्न अवश्य करना चाहिए कि क्या हमारी कृष्णभक्ति केवल उत्सव तक सीमित है या वास्तव में हमारे जीवन और आचरण में भी कृष्ण के विचारों का प्रकाश दिखाई देता है।
आज हमारे समाज में धार्मिक उत्सवों का विस्तार हुआ है। जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिरों की भव्य सजावट होती है, घरों में बाल गोपाल की झांकियां सजती हैं, भजन-कीर्तन होते हैं, शोभायात्राएं निकलती हैं और मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उल्लास मनाया जाता है। यह सब हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का सुंदर स्वरूप है। उत्सव आवश्यक हैं, क्योंकि वे समाज को जोड़ते हैं, नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से परिचित कराते हैं और सामूहिक चेतना को मजबूत करते हैं। लेकिन उत्सव तभी सार्थक है जब वह हमारे भीतर भी कोई परिवर्तन पैदा करे। यदि हम जन्माष्टमी के दिन कृष्ण का नाम लें, उनके सामने दीप जलाएं, माखन-मिश्री का भोग लगाएं, गीता का पाठ करें और अगले ही दिन अपने व्यवहार में झूठ, छल, अहंकार, लोभ, क्रोध और अन्याय को उसी प्रकार बनाए रखें, तो हमें अपनी भक्ति के स्वरूप पर विचार करना चाहिए। भक्ति केवल बाहरी प्रदर्शन का नाम नहीं है। भक्ति मनुष्य के भीतर परिवर्तन का नाम है। भक्ति का उद्देश्य मन को निर्मल करना है, अहंकार को कम करना है, कर्म को पवित्र करना है और जीवन को धर्ममय बनाना है। जिस भक्ति से व्यक्ति विनम्र, सत्यनिष्ठ, कर्तव्यपरायण और संवेदनशील बने, वही वास्तविक भक्ति है।
आज सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि हम भगवान श्रीकृष्ण को केवल पूजें नहीं, उन्हें समझें भी। हम कृष्ण की मूर्ति को सजाते हैं, लेकिन क्या हमने कृष्ण के विचारों को अपने जीवन में सजाया है? हम गीता को अपने घर के पूजाघर में रखते हैं, लेकिन क्या उसके संदेश को अपने व्यवहार में स्थान दिया है? हम कृष्ण का नाम जपते हैं, लेकिन क्या उनके बताए कर्मयोग को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? हम भगवान के प्रति अनादर देखकर आहत होते हैं, लेकिन क्या हम अपने आचरण से भगवान की गरिमा बढ़ाने का प्रयास करते हैं? ये प्रश्न कठोर अवश्य हैं, लेकिन आज की धार्मिक चेतना के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण का वास्तविक सम्मान केवल उनके नाम का उच्चारण करने से नहीं, बल्कि उनके संदेश को जीवन में उतारने से होगा।
वर्तमान समय में विभिन्न माध्यमों से देवी-देवताओं के अनुचित, असंवेदनशील अथवा आपत्तिजनक चित्रण की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं। व्याख्यानों, पुस्तकों, नाटकों, चलचित्रों, विज्ञापनों, डिजिटल सामग्री और विभिन्न उत्पादों के माध्यम से धार्मिक प्रतीकों का ऐसा उपयोग भी देखने को मिलता है, जिसे श्रद्धालु अपनी आस्था और धार्मिक भावनाओं के प्रतिकूल मानते हैं। आधुनिक अभिव्यक्ति के साधनों ने विचारों को व्यापक पहुंच प्रदान की है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी बढ़ी है। किसी की धार्मिक आस्था का सम्मान करना सभ्य समाज का मूल दायित्व है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और कानूनी उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है। इसलिए यदि किसी विज्ञापन, पुस्तक, फिल्म, कार्यक्रम, उत्पाद अथवा अन्य माध्यम से धार्मिक भावनाएं आहत होती प्रतीत हों, तो समाज को सजग रहना चाहिए और अपनी आपत्ति को शांतिपूर्ण, संयमित तथा वैधानिक तरीके से संबंधित संस्था, निर्माता, आयोजक अथवा प्रशासन के समक्ष रखना चाहिए। लिखित शिकायत, संवाद, उचित प्रशासनिक प्रक्रिया, उपलब्ध कानूनी माध्यम और शांतिपूर्ण बहिष्कार लोकतांत्रिक समाज में अपनी असहमति व्यक्त करने के वैध रास्ते हो सकते हैं। हमें यह सदैव याद रखना चाहिए कि धर्म की रक्षा के नाम पर हिंसा या कानून को अपने हाथ में लेना धर्म की रक्षा नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म के लिए संघर्ष की प्रेरणा दी, लेकिन उस संघर्ष का उद्देश्य धर्म की स्थापना था, अराजकता पैदा करना नहीं। इसलिए हमारी आवाज दृढ़ हो सकती है, हमारा विरोध स्पष्ट हो सकता है, हमारा बहिष्कार प्रभावी हो सकता है, लेकिन हमारी मर्यादा नहीं टूटनी चाहिए।
किसी उत्पाद या कार्यक्रम से धार्मिक भावनाएं आहत हों तो शांतिपूर्ण बहिष्कार नागरिक की एक लोकतांत्रिक शक्ति हो सकता है। उपभोक्ता यह निर्णय ले सकता है कि वह किसी ऐसे उत्पाद को नहीं खरीदेगा, उसका प्रचार नहीं करेगा और संबंधित संस्था से सुधार की मांग करेगा। लेकिन बहिष्कार को घृणा या हिंसा का माध्यम बनाना उचित नहीं है। हमें यह समझना होगा कि सनातन संस्कृति की शक्ति उसकी सहिष्णुता, विवेक और मर्यादा में है। अपनी आस्था का सम्मान करना और दूसरों की आस्था के प्रति भी संयम रखना हमारी सभ्यता की पहचान है। इसलिए देवी-देवताओं के अनादर के विरुद्ध आवाज उठाना आवश्यक है, लेकिन उस आवाज में भारतीय संस्कारों की गरिमा भी दिखाई देनी चाहिए।
इसी संदर्भ में देवी-देवताओं की वेशभूषा धारण कर सार्वजनिक स्थानों पर भीख मांगने जैसी गतिविधियों के प्रति भी समाज में जागरूकता उत्पन्न करने की आवश्यकता है। भगवान श्रीकृष्ण का मुकुट, मोरपंख, बांसुरी, पीतांबर और बाल गोपाल का स्वरूप करोड़ों लोगों की श्रद्धा से जुड़ा हुआ है। यह केवल किसी कलाकार की पोशाक नहीं है। इसलिए धार्मिक प्रतीकों को केवल आर्थिक लाभ अथवा भीख मांगने का साधन बना देना निश्चित रूप से विचार का विषय है। लेकिन इस विषय पर समाज का दृष्टिकोण संवेदनशील भी होना चाहिए। गरीबी या विवशता से जूझ रहे किसी व्यक्ति का अपमान करना समाधान नहीं है। यदि कोई व्यक्ति आर्थिक संकट के कारण ऐसी स्थिति में पहुंचा है, तो समाज को उसके प्रति करुणा रखते हुए सहायता के सम्मानजनक विकल्प उपलब्ध कराने चाहिए। धार्मिक प्रतीकों की गरिमा और जरूरतमंद मनुष्य की गरिमा दोनों की रक्षा करना ही हमारी संस्कृति का सही मार्ग है। मंदिरों, सामाजिक संगठनों और सेवा संस्थाओं को चाहिए कि वे ऐसे जरूरतमंद लोगों के लिए भोजन, वस्त्र, शिक्षा, कौशल और रोजगार सहायता जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दें, ताकि किसी व्यक्ति को धार्मिक वेशभूषा को आजीविका का साधन बनाने की विवशता न हो।
आज धर्म के सामने एक और बड़ी चुनौती है—भक्ति और पाखंड के बीच अंतर मिटता जाना। धार्मिक आयोजन बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन यदि धर्म केवल प्रदर्शन बन जाए तो उसकी आत्मा कमजोर हो जाती है। आज सोशल मीडिया के युग में धार्मिकता भी कई बार प्रदर्शन का विषय बन जाती है। पूजा के साथ तस्वीरें, वीडियो, प्रचार और दिखावा बढ़ता जा रहा है। इसमें कोई बुराई नहीं यदि उद्देश्य प्रेरणा और सकारात्मक संदेश देना हो, लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब भक्ति व्यक्ति के अहंकार को बढ़ाने का साधन बन जाए। भगवान श्रीकृष्ण ने हमें अहंकार से ऊपर उठने का संदेश दिया है। इसलिए हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि हमारी भक्ति हमें विनम्र बना रही है या अहंकारी? हमारी पूजा हमें संवेदनशील बना रही है या केवल प्रदर्शनप्रिय? हमारा धार्मिक आयोजन समाज में संस्कार बढ़ा रहा है या केवल शोर? यदि जन्माष्टमी के बाद एक भी बच्चे में संस्कार की ज्योति जलती है, एक भी युवा नशे से दूर होता है, एक भी परिवार गीता पढ़ने का संकल्प लेता है, एक भी व्यक्ति झूठ और छल छोड़ने का निर्णय करता है और एक भी जरूरतमंद को सम्मानपूर्वक सहायता मिलती है, तो जन्माष्टमी का उत्सव सार्थक माना जा सकता है।
भगवान श्रीकृष्ण की सबसे बड़ी शिक्षा कर्म की है। उन्होंने मनुष्य को कर्म से भागने नहीं दिया। उन्होंने अर्जुन से कहा कि उसका अधिकार कर्म पर है। इस संदेश को आज के समाज को फिर से समझने की आवश्यकता है। आज हम अधिकारों की बात तो बहुत करते हैं, लेकिन कर्तव्यों की चर्चा कम करते हैं। हम सम्मान चाहते हैं, लेकिन दूसरों का सम्मान करना भूल जाते हैं। हम व्यवस्था में सुधार चाहते हैं, लेकिन अपने व्यक्तिगत आचरण में सुधार करने के लिए तैयार नहीं होते। हम समाज में भ्रष्टाचार के विरोध में आवाज उठाते हैं, लेकिन छोटे स्तर पर नियम तोड़ने को सामान्य मान लेते हैं। हम धर्म की रक्षा की बात करते हैं, लेकिन धर्म के मूल सिद्धांत—सत्य, संयम, दया, न्याय और कर्तव्य—को जीवन में उतारने से बचते हैं। यह विरोधाभास समाप्त करना होगा।
कृष्णभक्ति का पहला प्रमाण चरित्र है। जिस व्यक्ति के आचरण में सत्य है, वही कृष्ण के निकट है। जिस व्यक्ति के व्यवहार में करुणा है, वही कृष्ण के संदेश को समझता है। जो अपने कर्तव्य से भागता नहीं, जो अन्याय का समर्थन नहीं करता, जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के हित के बारे में सोचता है, वही कृष्ण की वास्तविक शिक्षाओं का अनुसरण करता है। कृष्ण के हाथ में बांसुरी है तो उनके जीवन में अदम्य साहस भी है। कृष्ण प्रेम के प्रतीक हैं तो धर्म की स्थापना के लिए संघर्ष के भी प्रतीक हैं। कृष्ण मुस्कान के प्रतीक हैं तो नीति और विवेक के भी प्रतीक हैं। यही उनका विराट स्वरूप है और यही कारण है कि वे युगों से भारतीय चेतना के केंद्र में बने हुए हैं।
आज की युवा पीढ़ी को विशेष रूप से कृष्ण के जीवन और गीता के संदेश से जोड़ने की आवश्यकता है। आधुनिक जीवन में प्रतिस्पर्धा, असफलता का भय, भविष्य की चिंता, सामाजिक तुलना और डिजिटल दुनिया के आकर्षण ने युवाओं के सामने अनेक नई चुनौतियां खड़ी की हैं। ऐसे समय में कृष्ण का संदेश उन्हें मानसिक दृढ़ता और कर्म का मार्ग दे सकता है। उन्हें समझाना होगा कि असफलता जीवन का अंत नहीं है, कि कठिन परिस्थिति से भागना समाधान नहीं है, कि अपने कर्तव्य को पहचानना आवश्यक है और कि सफलता का अर्थ केवल धन या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि चरित्र और उद्देश्यपूर्ण जीवन भी है। यदि हमारी युवा पीढ़ी कृष्ण को केवल जन्माष्टमी की झांकी में देखेगी तो वह कृष्ण के विराट स्वरूप से परिचित नहीं हो पाएगी। उसे कृष्ण को विचार के रूप में समझना होगा, जीवन-दर्शन के रूप में स्वीकार करना होगा और गीता को केवल धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि जीवन-संघर्ष में मार्गदर्शक ग्रंथ के रूप में पढ़ना होगा।
हमारे घरों में गीता हो, यह अच्छी बात है; लेकिन हमारे जीवन में गीता हो, यह उससे भी बड़ी बात है। हमारे बच्चों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि कृष्ण भगवान हैं। उन्हें यह भी बताना होगा कि कृष्ण ने क्या सिखाया। उन्हें समझाना होगा कि धर्म क्या है, कर्तव्य क्या है, सत्य क्या है, संयम क्या है और अन्याय के सामने खड़े होने का साहस क्या है। परिवार ही संस्कार की पहली पाठशाला है। यदि माता-पिता स्वयं सत्य, अनुशासन और सम्मान का जीवन जीएंगे, तो बच्चों पर उसका प्रभाव पड़ेगा। यदि हम चाहते हैं कि अगली पीढ़ी सनातन संस्कृति की रक्षा करे, तो हमें पहले अपने घरों में संस्कार की ज्योति जलानी होगी।
धर्म की रक्षा केवल भाषणों, नारों और विरोध-प्रदर्शनों से नहीं होगी। धर्म की रक्षा चरित्र से होगी। धर्म की रक्षा शिक्षा से होगी। धर्म की रक्षा संस्कारों से होगी। धर्म की रक्षा परिवार की एकता से होगी। धर्म की रक्षा समाजसेवा से होगी। धर्म की रक्षा सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े होने से होगी। धर्म की रक्षा वैधानिक और शांतिपूर्ण जागरूकता से होगी। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि धर्म की रक्षा हमारे अपने आचरण से होगी।
इस जन्माष्टमी हमें केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं मनाना चाहिए, बल्कि अपने भीतर एक नई कृष्ण-चेतना के जन्म का संकल्प लेना चाहिए। मंदिर में दीप जलाने के साथ अपने भीतर विवेक का दीप जलाना चाहिए। भगवान को माखन-मिश्री का भोग लगाने के साथ अपने व्यवहार में मधुरता लाने का प्रयास करना चाहिए। कृष्ण का नामजप करने के साथ उनके कर्मयोग को समझना चाहिए। गीता का पाठ करने के साथ उसके संदेश को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। देवी-देवताओं के सम्मान की रक्षा करनी चाहिए, लेकिन यह कार्य शांतिपूर्ण, संयमित और कानूनसम्मत तरीके से करना चाहिए। किसी भी आपत्तिजनक सामग्री के प्रति अपनी असहमति व्यक्त करनी चाहिए, लेकिन बिना सत्यापन के अफवाहों को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। धर्म की रक्षा के नाम पर किसी व्यक्ति के प्रति घृणा या हिंसा को स्थान नहीं देना चाहिए।
हमें यह भी समझना होगा कि भगवान श्रीकृष्ण का सम्मान केवल तब नहीं होना चाहिए जब कोई उनके चित्र या स्वरूप का अनादर करे। यदि हम कृष्ण के चित्र का अपमान देखकर आहत होते हैं तो हमें कृष्ण के विचारों की उपेक्षा देखकर भी चिंतित होना चाहिए। यदि हमें मंदिर में भगवान की मूर्ति पर धूल दिखाई देती है तो हमें अपने समाज के चरित्र पर जमती धूल भी दिखाई देनी चाहिए। यदि हम भगवान के मंदिर की स्वच्छता का ध्यान रखते हैं तो हमें अपने मन की स्वच्छता का भी ध्यान रखना चाहिए। यदि हम जन्माष्टमी पर कृष्ण के जन्म की खुशी मनाते हैं तो हमें अपने भीतर सत्य, धर्म और सदाचार का जन्म भी कराना चाहिए। यही वास्तविक कृष्ण चेतना है।
आज आवश्यकता ऐसे कृष्णभक्तों की है जो केवल मंदिरों में दिखाई न दें, बल्कि अपने चरित्र से समाज में दिखाई दें। ऐसे कृष्णभक्तों की आवश्यकता है जो केवल मंच से धर्म की बात न करें, बल्कि अपने जीवन में धर्म का आचरण करें। ऐसे भक्तों की आवश्यकता है जो धार्मिक प्रतीकों के सम्मान के लिए आवाज उठाएं, लेकिन कानून और मर्यादा का पालन करते हुए। ऐसे भक्तों की आवश्यकता है जो जरूरतमंदों की सहायता करें, बच्चों को संस्कार दें, युवाओं को गीता से जोड़ें और समाज में सत्य, सेवा तथा सदाचार की भावना को मजबूत करें।
जन्माष्टमी हमें हर वर्ष यह संदेश देती है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, प्रकाश का जन्म संभव है। अत्याचार चाहे कितना भी शक्तिशाली दिखाई दे, धर्म की शक्ति उससे बड़ी हो सकती है। परिस्थितियां चाहे कितनी ही कठिन क्यों न हों, मनुष्य अपने कर्तव्य से पीछे हटे बिना जीवन को सार्थक बना सकता है। यही कृष्ण का संदेश है और यही आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता भी है।
इसलिए आइए, इस जन्माष्टमी केवल इतना न कहें कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, बल्कि यह संकल्प लें कि आज हमारे भीतर भी कृष्ण के विचारों का जन्म होगा। हमारे भीतर सत्य का जन्म होगा, कर्तव्य का जन्म होगा, करुणा का जन्म होगा, विवेक का जन्म होगा और धर्म के लिए खड़े होने का साहस जन्म लेगा। हम कृष्ण के स्वरूप का सम्मान करेंगे, कृष्ण के संदेश का सम्मान करेंगे और अपने जीवन को ऐसा बनाएंगे कि हमारे कर्मों से भगवान श्रीकृष्ण की गरिमा बढ़े।
भगवान श्रीकृष्ण का अनादर रोकना आवश्यक है, लेकिन उससे भी बड़ा कार्य है कृष्ण के आदर्शों का सम्मान करना। देवी-देवताओं की गरिमा की रक्षा आवश्यक है, लेकिन उससे भी बड़ी आवश्यकता है अपने समाज के चरित्र की गरिमा की रक्षा करना। धार्मिक उत्सव आवश्यक हैं, लेकिन उनसे भी अधिक आवश्यक है धर्म को जीवन में उतारना। भक्ति आवश्यक है, लेकिन भक्ति के नाम पर पाखंड से बचना उससे भी अधिक आवश्यक है।
आइए, इस जन्माष्टमी हम मंदिर में केवल दर्शन करने न जाएं, बल्कि अपने अंतर्मन में भी दर्शन करें। केवल भगवान के सामने सिर न झुकाएं, बल्कि अपने अहंकार को भी झुकाएं। केवल कृष्ण का नाम न लें, बल्कि कृष्ण के कर्मयोग को अपनाएं। केवल उनके जन्म का उत्सव न मनाएं, बल्कि अपने जीवन में धर्म और सदाचार का नया अध्याय आरंभ करें।
क्योंकि जिस दिन हमारे भीतर सत्य का जन्म होगा, उस दिन अधर्म कमजोर होगा। जिस दिन हमारे भीतर कर्तव्य का जन्म होगा, उस दिन पलायन समाप्त होगा। जिस दिन हमारे भीतर करुणा का जन्म होगा, उस दिन समाज मजबूत होगा। जिस दिन हमारे भीतर विवेक का जन्म होगा, उस दिन पाखंड कमजोर होगा। और जिस दिन हमारे भीतर धर्म का साहस जागेगा, उस दिन अन्याय के सामने समाज सिर उठाकर खड़ा होगा।
यही सच्ची कृष्णभक्ति है। यही जन्माष्टमी का वास्तविक संदेश है। यही सनातन संस्कृति की शक्ति है और यही हमारे जीवन की सार्थकता है।
आइए, कृष्ण को केवल पूजाघर में नहीं, अपने चरित्र में स्थापित करें। भक्ति को केवल भावना नहीं, आचरण बनाएं। धर्म को केवल शब्द नहीं, जीवन का आधार बनाएं और इस जन्माष्टमी से एक ऐसे समाज के निर्माण का संकल्प लें जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा भी हो, उनके संदेश के प्रति निष्ठा भी हो और उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का साहस भी हो।
जय श्रीकृष्ण!
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