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तीसरी क़सम के बाद

तीसरी क़सम के बाद

डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी
मानपुर का वह बस स्टैंड महज धूल और धुएँ का एक अनाम कोना नहीं था; वह तो माई के कड़े उसूलों और उसके जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों की एक जीवंत अदालत थी। माई की गुमटी पर सुलगते चूल्हे की आंच में सिर्फ चाय नहीं पकती थी, बल्कि इंसानी फितरत को तौलने का उसका अपना एक तराजू भी था। माई, जिसकी झुर्रियों में न जाने कितने धोखे और तजुर्बे दफ्न थे, हीरामन की तरह ही जिंदगी से कुछ कड़वे सबक सीख चुकी थी। उसने भी अपने जीवन में तीन कसमें खा रखी थीं, जो उसके लिए किसी धर्मग्रंथ के वाक्यों से कम नहीं थीं
उसकी पहली कसम थी— "विद्यार्थियों को चाय नहीं पिलाऊंगी।"
कारण स्पष्ट था। अल्हड़ उम्र के ये लड़के आते, हंसी-ठिठोली करते, कुल्हड़ की चाय का आनंद लेते, और जब पैसे चुकाने की बारी आती, तो कोई न कोई बहाना बनाकर या साइकिल की घंटी बजाते हुए फुर्र हो जाते। माई भला अपनी बूढ़ी देह के साथ उन हवा से बातें करने वाले लड़कों का पीछा कैसे करती!
उसकी दूसरी कसम थी— "नेताओं को चाय नहीं दूंगी।"
खादी के उजले कुर्ते पहने ये नेता चुनाव के मौसम में आते। माई की गाढ़ी, मलाईदार चाय पीकर गला तर करते और बदले में केवल कोरे आश्वासनों का सिक्का थमा जाते। "अरे माई, इस बार जीतने दो, तुम्हारी यह झोपड़ी पक्की करवा देंगे।" माई इन खोखले वादों की हकीकत को बखूबी पहचानती थी, इसलिए नेताओं के लिए उसके चूल्हे की आग हमेशा के लिए ठंडी हो चुकी थी।
और फिर थी उसकी तीसरी कसम, जिसे उसने मुद्दतों पहले खा लिया था— "मास्टरों को चाय नहीं पिलाऊंगी।"
माई का मानना था कि ये मास्टर लोग दुनिया भर का ज्ञान बघारते हैं, लेकिन जेब ढीली करने में इनकी जान जाती है। ये चाय पीते वक्त मोल-भाव करते, एक-एक पैसे का हिसाब जोड़ते और हमेशा तय कीमत से कम पैसा थमाकर चलते बनते। माई को अपनी मेहनत और अपनी चाय की गुणवत्ता से इस तरह का समझौता कतई मंजूर न था। इसलिए, मास्टरों के लिए उसकी गुमटी के दरवाजे हमेशा के लिए बंद थे।
माई के इन कड़े उसूलों के बीच, उसकी दुकान पर केवल 'बैंक वाले बाबुओं' का ही स्वागत होता था। एक रुपये में एक कप लबालब चाय, जिसमें दूध की मिठास और माई का स्नेह दोनों घुले होते थे।
उस दिन की बात है, जब हम नौ लोगों की टोली बस से मानपुर स्टैंड पर उतरी। हमारे समूह में बैंक के कुछ बड़े अधिकारी शामिल थे— को-ऑपरेटिव वाले सतीश बाबू, शेखपुरा के एडीएम शेखर बाबू, और बैंकों के एरिया मैनेजर सिन्हा साहब। उनके साथ अक्सर रहने के कारण, माई मुझे भी 'बैंक वाला बाबू' ही मानती थी।
हमें देखते ही माई के रूखे चेहरे पर एक आत्मीय चमक आ गई। उसने बड़े ही चाव से चूल्हे की आंच तेज की। जल्द ही नौ कुल्हड़ों में खौलती हुई, भाप छोड़ती सोंधी चाय हमारे हाथों में थमा दी गई। चाय की वह खुशबू सफर की सारी थकान मिटाने के लिए काफी थी।
हम लोग चाय की चुस्की लेने ही वाले थे कि आपस में कुछ हंसी-मजाक और खुसुर-पुसुर शुरू हो गई। माई की पैनी निगाहें तुरंत ताड़ गईं कि आज इस टोली के कुछ चेहरों पर बैंक वालों जैसा वह चिर-परिचित रुआब नहीं है। उसने माथे से खिसकते पल्लू को सँभाला, उसकी आँखों में शक की एक लकीर खिंच गई, और उसने ठेठ मगही अंदाज में पूछा, "का हो? तोहनी बैंक वाला न हहु का?"
तभी हमारे बीच खड़े सीधे-सादे बनर्जी बाबू, जो पेशे से शिक्षक थे, ने अपनी भोली जुबान से बिना किसी लाग-लपेट के सच उगल दिया, "ना भई, हमनी तो मास्टर ही, मास्टर।"
बस, इतना सुनना था कि माई के चेहरे का रंग ही बदल गया। जैसे किसी ने उसके बरसों पुराने तप को भंग कर दिया हो। उसे तुरंत अपनी वह 'तीसरी कसम' याद आ गई, जो उसने बहुत पहले खाई थी।
"मास्टर ही मास्टर! द दऽ ,दे द हमर चाय!"
माई का स्वर अब किसी ममतामयी चाय वाली का नहीं, बल्कि अपने उसूलों पर आंच आते देख भड़की हुई एक शेरनी का था। वह झपटते हुए आगे बढ़ी और बिजली की फुर्ती से हम सबके हाथों से चाय के भरे हुए कुल्हड़ एक-एक करके ऐसे छीनने लगी, जैसे कोई माँ अपने बच्चों से गलत चीज छीन रही हो। चाय के गर्म होने की परवाह किए बिना उसने पल भर में सारे कप वापस ले लिए।
हम नौ के नौ लोग हक्के-बक्के रह गए। जो चाय हमारे होठों तक पहुँचने वाली थी, वह अब माई के हाथों में वापस जा चुकी थी।
किसी ने हकलाते हुए पूछा, "अरे... हुआ क्या?"
माई ने अपने हाथों में कुल्हड़ सँभालते हुए दो टूक जवाब दिया, "हम खाली बैंक वाला के चाय पियावही! ई मास्टर-वास्टर के ना! ई लोग मोल-भाव करै छै।"मानपुर के उस छोटे से बस स्टैंड पर, हम खाली हाथ खड़े उस बूढ़ी माई के कड़े उसूलों और उसकी उस अटूट 'तीसरी कसम' को निहारते रह गए। चाय की भाप अभी भी हवा में तैर रही थी, और उसके साथ तैर रहा था माई के उसूलों का वह कड़वा लेकिन सच्चा स्वाद, जो हमें बिना चाय पिए ही जीवन भर के लिए मिल गया था।
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