मेरे भारत का हर अंदाज निराला
कुमार महेंद्रहिमगिरि जिसका मुकुट सुहाना,
सागर जिसके चरण पखारे।
चारों दिशाओं में गूँज रहे,
अनेकता में एकता के जयकारे।
जहाँ पग-पग पर भाषा बदले,
फिर भी प्रेम की एक ही माला।
मेरे भारत का हर अंदाज निराला।।
ऋषि-मुनियों की पावन धरती,
त्याग-तपस्या पाठ पढ़ाती।
ज्ञान-विज्ञान की ज्योति जलाकर,
जग का तम हरती, मुस्काती।
वीरों की हुंकार यहाँ है,
संतों के ज्ञान का अमृत प्याला।
मेरे भारत का हर अंदाज निराला।।
गंगा की धारा-सा पावन मन,
सर्वधर्म का होता वंदन।
‘अतिथि देवो भवः’ की संस्कृति,
माथे शोभे तिलक-चंदन।
त्योहारों के रंग सजे हैं,
हर घर खुशियों का उजाला।
मेरे भारत का हर अंदाज निराला।।
उठो युवा! अब कदम बढ़ाओ,
नूतन इतिहास नया गढ़ना है।
विश्व-पटल पर भारत-माता का,
गौरव और ऊँचा करना है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का मंत्र लिए,
बढ़ रहा देश यह मतवाला।
मेरे भारत का हर अंदाज निराला।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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