"प्रज्ञा का विस्तृत पथ"
पंकज शर्मामन की चंचल वृत्तियाँ,
और शून्य का पार,
बीच में बहती एक
अनकही सी धार।
ध्यान के केंद्र से
मुड़ता एक मोड़,
ले चला मन को
पुरानी दिशा छोड़।
जहाँ एक नई
चेतना जगाती है,
दिव्य सी रोशनी
नज़रों में आती है।
समझ जब हमारी
मार्गदर्शक बनती है,
तब नज़र अनंत
सत्य को परखती है।
साधारण से परे
एक रूप दिखता है,
ज्ञान का अनोखा
पाठ मन सीखता है।
अनुभव का एक
नया फूल खिलता है,
सब कुछ छोड़
सच्चा ज्ञान मिलता है।
परम शांति का
अहसास गहराता है,
भटका हुआ मन
अपना ठिकाना पाता है।
भीतर का यह उजाला
जीवन में छा जाता है,
और फिर हर इंसान
खुद से मिल पाता है।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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