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तुम्हारे नयन मधुशाला से

तुम्हारे नयन मधुशाला से

कुमार महेंद्र
न कोई जाम की चाह रही,
न रहा साकी से वास्ता।
एक पल में सदियों का नशा,
मिट गया जग का हर रास्ता।
घुलती है रात इन पलकों में,
ज्यों रजनी लिपटी मधुबाला से।
तुम्हारे नयन मधुशाला से।।


झुकें तो लाज का सागर हैं,
उठें तो प्रभात-सी आभा।
इन गहरी झील-सी आँखों में,
बसती प्रेम-भरी मधुर चाह।
बाँध लिया है इस हृदय को,
काजल की कोमल-सी माला से।
तुम्हारे नयन मधुशाला से।।


ये मूक निमंत्रण देते हैं,
बिन बोले सब कह जाते हैं।
जो डूबे इनकी गहराई में,
वे भवसागर तर जाते हैं।
भटका था राही वर्षों से,
अब राह मिली तेरी छाया से।
तुम्हारे नयन मधुशाला से।।


दुनिया के सारे मधुशाले,
तेरे नयनों के आगे फीके हैं।
जीने के मधुर सलीके भी,
हमने इनसे ही सीखे हैं।
मन तृप्त हुआ बस निहारकर,
तेरी चितवन की मधु-ज्वाला से।
तुम्हारे नयन मधुशाला से।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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