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मैं खोया हूँ तुम्हारे वस्ल में

मैं खोया हूँ तुम्हारे वस्ल में

कुमार महेंद्र
जैसे कोई सरिता,
सिंधु में समाए।
जैसे मौन अधरों पर,
गीत कोई मुस्काए।
काल ठहर-सा गया है,
मखमली पल में।
मैं खोया हूँ तुम्हारे वस्ल में।।


तुम्हारी नयन-झील के,
शांत-सौम्य दर्पण में।
झिलमिल करता प्रेम हमारा,
साँसों के स्पंदन में।
सदियों से तृषित हृदय को,
मिल गया सुख-संबल में।
मैं खोया हूँ तुम्हारे वस्ल में।।


न जग की सुधि शेष रही,
न कोई रहा बंधन।
हवाओं में घुलता जाता,
तुम्हारी प्रीत का चंदन।
स्पर्श की पावन अनुभूति,
खिल उठी हृदय-कमल में।
मैं खोया हूँ तुम्हारे वस्ल में।।


रजत-रश्मियों से धुला,
यह अनुपम प्रेम-मिलन।
मिट गईं सारी दूरियाँ,
मिट गया अपना-पराया मन।
तुम मुझमें और मैं तुममें,
घुल गए जैसे निर्मल जल में।
मैं खोया हूँ तुम्हारे वस्ल में।।


तुम्हीं आदि, तुम्हीं अंत हो,
तुम ही जीवन-धारा।
तुमसे ही अर्थ मिला है,
तुमसे जग यह प्यारा।
एकाकार हुए ऐसे,
जैसे ज्योति समाई दीपक के उज्ज्वल में।
मैं खोया हूँ तुम्हारे वस्ल में।।


विरह-वेदना भी आज,
बन गई प्रेम-कहानी।
अश्रु-बिंदु बनकर बरसी,
याद तुम्हारी सुहानी।
जो था अधूरा जन्मों से,
मिल गया प्रेम के आँचल में।
मैं खोया हूँ तुम्हारे वस्ल में।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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