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लोहार्गल परिक्रमा, लोक आस्था का शिखर

लोहार्गल परिक्रमा, लोक आस्था का शिखर

कुमार महेंद्र
शेखावाटी का हरिद्वार-सा,
लोहार्गल आकर्षण अनुपम।
पाप-मोक्ष की आस लिए,
उमड़ा श्रद्धामय जन-गण।
जन-जन उपासना में लीन,
अंतःकरण निर्मल, भाव प्रखर।
लोहार्गल परिक्रमा, लोक आस्था का शिखर।।


संस्कार-परंपराएँ अभिवंदित,
भक्ति-भाव का भव्य संगम।
सनातन उल्लास की छटा निराली,
हर दृश्य लगे अति मनोरम।
नर-नारी, बच्चे, युवा झूम रहे,
सुन गीत-भजन मोहक स्वर।
लोहार्गल परिक्रमा, लोक आस्था का शिखर।।


रंग-बिरंगी संस्कृति-वेशभूषा,
ग्रामीण-शहरी जीवन-मिश्रण।
नर-नारी, वरिष्ठ, युवा, बाल-वृंद,
उमंगित हृदयों का स्नेह मिलन।
हँसी-खुशी के पल हों सुंदर,
स्नेह-सद्भाव का मधुर असर।
लोहार्गल परिक्रमा, लोक आस्था का शिखर।।


बिखर रही हैं चारों ओर खुशियाँ,
मिट रहा दुःख-कष्ट-संताप।
तीर्थयात्रा, भक्ति-आराधना,
हर ले मन के सारे ताप।
पुण्य-स्नान की पावन बेला,
कर-कमल सेवा में अग्रसर।
लोहार्गल परिक्रमा, लोक आस्था का शिखर।।


श्रद्धा-भाव से बढ़ते चरण,
मन में जागे नव-आलंबन।
अनुपम सामाजिक समरसता,
सेवा-भाव से भरा मिलन।
परिक्रमार्थी के प्रति सद्भाव,
सर्वत्र कौमी एकता मुखर।
लोहार्गल परिक्रमा, लोक आस्था का शिखर।।


भाद्रपद अमावस्या पुनीत बेला,
चौबीस कोसी परिक्रमा चरम बिंदु।
जयघोषों से गूँज रहा है,
अरावली का अंतर सिंधु।
समाज, शासन, प्रशासन, पुलिस,
हर कदम सहयोग हेतु तत्पर।
लोहार्गल परिक्रमा, लोक आस्था का शिखर।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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