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तुम प्रेम का मानक, तुम ही प्रेम की इकाई हो

तुम प्रेम का मानक, तुम ही प्रेम की इकाई हो

कुमार महेंद्र
इस सृष्टि के कण-कण में जो,
प्रेम-सुधा बन छाई हो।
तुम उस व्यापक परम सत्य की,
सुंदर एक गवाही हो।
हृदय-पटल पर अंकित मेरी,
अनुपम अमिट लिखाई हो।
तुम प्रेम का मानक, तुम ही प्रेम की इकाई हो।।


जैसे विरह के तपते मरु में,
शीतल मधुर पुरवाई हो।
जैसे सूने-सूने अंबर में,
चंदा की मनहर परछाई हो।
मेरी धड़कन के मंदिर की,
तुम ही मधुर शहनाई हो।
तुम प्रेम का मानक, तुम ही प्रेम की इकाई हो।।


तुम पूजा का पावन जल हो,
तुम श्रद्धा की मूरत हो।
जग के सारे वैभव से,
बढ़कर मेरी ज़रूरत हो।
गंगा जैसी पावनता हो,
मानस जैसी गहराई हो।
तुम प्रेम का मानक, तुम ही प्रेम की इकाई हो।।


मौन समर्पण की भाषा को,
तुमने रूप प्रदान किया।
शून्य पड़े इस अंतर्मन को,
चाहत का वरदान दिया।
तुमसे ही जीवन का रूप-रंग,
तुमसे ही तरुणाई हो।
तुम प्रेम का मानक, तुम ही प्रेम की इकाई हो।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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