गरीबी
अरुण दिव्यांशजब देखा बच्चा मैल कुचैल ,
जा पूछा जीवन करीबी से ।
कैसा जीवन का अभिशाप ,
शिक्षा जाता यह गरीबी से ।।
जब घटा परिजन का आय ,
सूझा कहीं कोई न उपाय ।
मिले न जब बच्चे को खाना ,
भेजा बच्चे को बेचने चाय ।।
गया हाय बाय टाटा अब तो ,
उसके ऐसी ही कमाई से ।
कैसा विधि का यह विधान ,
नीच हुआ मैं अन्य भाई से ।।
गया जीवन से अब शिक्षा ,
किया जीवन का समीक्षा ।
गया जीवन का यह संस्कार ,
कर्म फल या कर्म परीक्षा ।।
ना कोई जीवन का है मीत ,
गया जीवन गीत शहनाई के ।
ना कोई आदर ना ही प्यार ,
कोई न जाने पीर पराई के ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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