किस्मत
अरुण दिव्यांशजीवन तो तेरा ये कर्म प्रधान ,
मजबूर क्यों अपनी लत से ।
रो रहे तुम किस्मत का रोना ,
तुम्हीं बता दो किस मत से ।।
किस्मत दोष किस मत से है ,
या दोष अपनी छिपा रहे हो ।
या कोई तू आडंबर बनाकर ,
स्वयं ही महान दिखा रहे हो ।।
दिखा रहे हो अपनी महानता ,
या तू महानता सीखा रहा है ।
सच्चे जीवन को ही तजकर ,
मिथ्या जीवन ही भा रहा है ।।
तज रहा सच्चा जीवन अपना ,
आडंबर तुझपर छा रहा है ।
झाॅंक ले तू गिरेबान में अपनी ,
सच तज तू कहाॅं जा रहा है ।।
ठुकरा रहे तुम कर्म को अपने ,
निज अल्प स्वार्थ के चक्कर में ।
हर कुछ है निज में ही समाहित ,
फिर नाम लिखा रहे फक्कर में ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार। ।
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