Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

किस्मत

किस्मत

अरुण दिव्यांश
जीवन तो तेरा ये कर्म प्रधान ,
मजबूर क्यों अपनी लत से ।
रो रहे तुम किस्मत का रोना ,
तुम्हीं बता दो किस मत से ।।
किस्मत दोष किस मत से है ,
या दोष अपनी छिपा रहे हो ।
या कोई तू आडंबर बनाकर ,
स्वयं ही महान दिखा रहे हो ।।
दिखा रहे हो अपनी महानता ,
या तू महानता सीखा रहा है ।
सच्चे जीवन को ही तजकर ,
मिथ्या जीवन ही भा रहा है ।।
तज रहा सच्चा जीवन अपना ,
आडंबर तुझपर छा रहा है ।
झाॅंक ले तू गिरेबान में अपनी ,
सच तज तू कहाॅं जा रहा है ।।
ठुकरा रहे तुम कर्म को अपने ,
निज अल्प स्वार्थ के चक्कर में ।
हर कुछ है निज में ही समाहित ,
फिर नाम लिखा रहे फक्कर में ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार। ।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ