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आयुर्वेद भारतीय चिकित्सा पद्धति की अक्षय निधि है, इसे राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति घोषित किया जाए:-डॉ. विवेकानंद मिश्र

आयुर्वेद भारतीय चिकित्सा पद्धति की अक्षय निधि है, इसे राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति घोषित किया जाए:-डॉ. विवेकानंद मिश्र

पटना। आयुर्वेद भारत की केवल एक प्राचीन चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन, प्रकृति-चिंतन और समग्र स्वास्थ्य-परंपरा की ऐसी अक्षय निधि है, जिसकी प्रासंगिकता आज के आधुनिक युग में भी निरंतर बनी हुई है। आयुर्वेद मनुष्य को केवल रोग से मुक्त करने की बात नहीं करता, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी व्यक्ति के रोग का शमन—दोनों को समान महत्त्व देता है। शरीर, मन, आहार, व्यवहार, ऋतु, प्रकृति और जीवनशैली के बीच संतुलन स्थापित करने की इसकी दृष्टि इसे विशिष्ट बनाती है। आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपनी इस गौरवशाली चिकित्सा विरासत को केवल इतिहास के पन्नों में सीमित न रखे, बल्कि उसे वर्तमान स्वास्थ्य व्यवस्था का सशक्त आधार बनाए।

इसी भावना को व्यक्त करते हुए विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े आयुर्वेद रक्षा एवं विकास संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विवेकानंद मिश्र ने कहा कि “आयुर्वेद भारतीय चिकित्सा पद्धति की अक्षय निधि है और इसे राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति का दर्जा दिया जाना चाहिए।” स्थानीय गोल बगीचा स्थित डॉक्टर विवेकानंद पथ पर आयोजित आयुर्वेद दिवस समारोह के शुभारंभ के अवसर पर उन्होंने आयुर्वेद की उपयोगिता, व्यापकता और वर्तमान स्थिति पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए।

डॉ. मिश्र ने कहा कि आयुर्वेद वेद की उस जीवनदृष्टि का विस्तार है जिसमें मनुष्य को प्रकृति से अलग नहीं, बल्कि प्रकृति का अभिन्न अंग माना गया है। उनके अनुसार आयुर्वेद को केवल किसी एक वर्ग, समुदाय अथवा चिकित्सकीय परंपरा से जोड़कर देखना उसके व्यापक स्वरूप को सीमित करना होगा। यह जीवन को स्वस्थ, संतुलित और दीर्घ बनाने की भारतीय दृष्टि का वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित स्वरूप है। भारतीय परंपरा में आयुर्वेद को पंचम वेद के रूप में भी सम्मानित किया गया है और इसके पीछे केवल धार्मिक भावबोध ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य तथा जीवन के प्रति विकसित हुई एक दीर्घकालीन चिंतन-परंपरा भी रही है।

उन्होंने कहा कि आयुर्वेद का मूल उद्देश्य केवल रोग का उपचार करना नहीं, बल्कि रोग की संभावना को कम करना और व्यक्ति को ऐसी जीवनशैली के प्रति जागरूक करना है, जिससे वह दीर्घकाल तक स्वस्थ रह सके। भोजन क्या हो, कब हो, किस प्रकार हो, ऋतु के अनुसार जीवनचर्या कैसी हो, शरीर की प्रकृति क्या है, दिनचर्या और रात्रिचर्या कैसी हो—इन सभी प्रश्नों पर आयुर्वेद ने सदियों पहले गंभीर चिंतन किया था। आज जब पूरी दुनिया जीवनशैली से जुड़े रोगों, तनाव, अनियमित खान-पान, मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य स्वास्थ्य चुनौतियों से जूझ रही है, तब आयुर्वेद की जीवनशैली आधारित दृष्टि पर पुनर्विचार की आवश्यकता और अधिक महसूस की जा रही है।

आयुर्वेद को केवल उपचार नहीं, जीवन-पद्धति के रूप में समझना होगा


डॉ. विवेकानंद मिश्र ने कहा कि आधुनिक समाज में स्वास्थ्य की अवधारणा धीरे-धीरे केवल बीमारी के उपचार तक सीमित होती जा रही है। जब व्यक्ति बीमार पड़ता है, तब अस्पताल और दवा की तलाश शुरू होती है। इसके विपरीत भारतीय आयुर्वेदिक परंपरा स्वास्थ्य की रक्षा को प्राथमिकता देती रही है। स्वस्थ व्यक्ति स्वस्थ कैसे बना रहे और रोगी व्यक्ति पुनः स्वास्थ्य कैसे प्राप्त करे—आयुर्वेद दोनों पक्षों को साथ लेकर चलता है।

उन्होंने कहा कि आयुर्वेद का यह पक्ष आज जन-जन तक पहुंचाने की आवश्यकता है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं, पंचायतों और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य-जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को भारतीय चिकित्सा परंपरा की मूल अवधारणाओं से परिचित कराया जाना चाहिए। इससे लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग हो सकेंगे और रोग होने के बाद उपचार कराने की बजाय स्वास्थ्य संरक्षण की दिशा में भी कदम बढ़ा सकेंगे।
सरकारी स्वास्थ्य नीति में आयुर्वेद की व्यापक भागीदारी की मांग

डॉ. मिश्र ने आयुर्वेद की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में आयुर्वेद को वह व्यापक स्थान नहीं मिल पाया है, जिसकी अपेक्षा की जाती रही है। उनका कहना था कि भारत जैसे विशाल देश में स्वास्थ्य सेवाओं को केवल एक चिकित्सा प्रणाली के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता। ग्रामीण भारत, दूरदराज के क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक सुलभ स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाने के लिए विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के समन्वित उपयोग की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि आयुर्वेद की पहुंच गांव-गांव तक रही है। स्थानीय औषधीय वनस्पतियों, पारंपरिक ज्ञान और जीवनशैली के आधार पर विकसित इसकी अनेक अवधारणाएं भारतीय समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना से लंबे समय से जुड़ी रही हैं। ऐसे में आयुर्वेद को स्वास्थ्य नीति के व्यापक ढांचे में अधिक प्रभावी स्थान देना समय की आवश्यकता है।

हालांकि आयुर्वेद के संबंध में किए जाने वाले दावों को वैज्ञानिक परीक्षण, चिकित्सकीय प्रमाण और उचित नियमन की कसौटी पर भी परखा जाना आवश्यक है। आयुर्वेद की वास्तविक शक्ति तभी व्यापक रूप से स्थापित हो सकती है, जब पारंपरिक ज्ञान के साथ आधुनिक अनुसंधान, गुणवत्ता नियंत्रण, मानकीकरण और प्रमाण आधारित चिकित्सा अनुसंधान को समान महत्व मिले। इससे आयुर्वेद की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी और भारत की प्राचीन चिकित्सा विरासत को आधुनिक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में नई पहचान मिलेगी।

चिकित्सा सेवा का उद्देश्य सेवा हो, केवल व्यवसाय नहीं


समारोह में डॉ. मिश्र ने स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ती व्यावसायिक प्रवृत्ति पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि चिकित्सा का मूल उद्देश्य मानव सेवा और जीवन रक्षा है। यदि स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह आर्थिक लाभ के दृष्टिकोण से संचालित होने लगे तो समाज के कमजोर और गरीब वर्गों के लिए गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधा प्राप्त करना कठिन हो सकता है।

उन्होंने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में आधुनिक तकनीक, अनुसंधान और विशेषज्ञता का अपना महत्त्व है, लेकिन इनके साथ मानवीय संवेदना और सेवा-भाव भी आवश्यक है। डॉक्टर और रोगी का संबंध केवल सेवा प्रदाता और उपभोक्ता का संबंध नहीं होना चाहिए। यह विश्वास, संवेदना और मानवीय उत्तरदायित्व पर आधारित संबंध है।

उन्होंने यह भी कहा कि महंगी चिकित्सा व्यवस्था का सबसे अधिक प्रभाव आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर पड़ता है। इसलिए सरकार को ऐसी स्वास्थ्य नीति विकसित करनी चाहिए जिसमें गरीब, ग्रामीण, महिला, वृद्ध और वंचित वर्ग के लोगों को गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधा सहजता से उपलब्ध हो सके।

गर्भावस्था से ही स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता जरूरी


डॉ. मिश्र ने बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज स्वास्थ्य संरक्षण की शुरुआत जन्म के बाद नहीं, बल्कि गर्भावस्था से ही की जानी चाहिए। गर्भवती महिलाओं के पोषण, मानसिक स्वास्थ्य, नियमित चिकित्सकीय परामर्श और सुरक्षित मातृत्व पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि परिवार और समाज को मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किए बिना स्वस्थ राष्ट्र की कल्पना पूरी नहीं हो सकती। आयुर्वेदिक परंपरा में गर्भावस्था, प्रसव और शिशु के विकास को लेकर विस्तृत चिंतन मिलता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियों के साथ पारंपरिक स्वास्थ्य-ज्ञान के उपयोगी पक्षों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए तो मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी चिकित्सा पद्धति को अपनाते समय प्रशिक्षित चिकित्सक की सलाह, वैज्ञानिक प्रमाण और रोगी की वास्तविक स्वास्थ्य-स्थिति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। आयुर्वेद को बढ़ावा देने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि गंभीर परिस्थितियों में आवश्यक आधुनिक चिकित्सा को नकार दिया जाए। इसके बजाय विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के बीच उचित समन्वय और रोगी-केंद्रित दृष्टिकोण विकसित किया जाना चाहिए।

आयुर्वेद की मूल भावना में प्रकृति के साथ संतुलन


आयुर्वेद की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक प्रकृति और मनुष्य के बीच संतुलन की अवधारणा है। भारतीय जीवन-पद्धति में ऋतु के अनुसार भोजन और दिनचर्या बदलने की परंपरा रही है। स्थानीय और मौसमी आहार को महत्त्व दिया गया। शरीर की क्षमता और प्रकृति के अनुसार जीवनचर्या निर्धारित करने की बात कही गई।

आज पर्यावरण प्रदूषण, अनियमित जीवनशैली और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के बीच जब पूरी दुनिया पर्यावरण और स्वास्थ्य के परस्पर संबंध को समझ रही है, तब आयुर्वेद की प्रकृति-केंद्रित दृष्टि पर नए सिरे से विचार किया जा सकता है।

आयुर्वेद केवल औषधियों का ज्ञान नहीं है। यह भोजन, निद्रा, व्यायाम, मानसिक संतुलन, स्वच्छता, ऋतुचर्या और संयमित जीवन के माध्यम से स्वस्थ रहने की समग्र अवधारणा प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि आयुर्वेद दिवस जैसे अवसर केवल औपचारिक आयोजन न रहकर जन-जागरूकता का माध्यम बनें, यह समय की आवश्यकता है।

जनजागरण से ही पुनर्स्थापित होगा आयुर्वेद का गौरव


इस अवसर पर आचार्य सच्चिदानंद मिश्र ने कहा कि आयुर्वेद की विपुल ख्याति और गौरवशाली अतीत का लंबा इतिहास रहा है। भारत ने चिकित्सा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जिस ज्ञान परंपरा का विकास किया, उसका अध्ययन आज भी अनेक स्तरों पर किया जा रहा है। किंतु वर्तमान समय में आयुर्वेद के मूल्यों और उपयोगिता को समाज में पुनर्स्थापित करने के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि केवल सरकारी स्तर पर योजनाएं बना देने से आयुर्वेद का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। समाज के चिकित्सकों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शोधकर्ताओं और युवाओं को भी इस दिशा में आगे आना होगा। जब गांव का सामान्य व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होगा और उसे अपने क्षेत्र में प्रशिक्षित चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध होगी, तभी स्वास्थ्य व्यवस्था का वास्तविक विकेंद्रीकरण संभव होगा।

आचार्य सच्चिदानंद मिश्र ने कहा कि चिकित्सा सुविधा का विस्तार केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का मजबूत नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए। आयुर्वेदिक चिकित्सकों, औषधीय पौधों और स्थानीय स्वास्थ्य परंपराओं को भी इस व्यवस्था में उचित स्थान दिया जा सकता है।

अनुसंधान और आधुनिक विज्ञान से जुड़े आयुर्वेद की आवश्यकता


आयुर्वेद की व्यापक स्वीकार्यता के लिए शोध और वैज्ञानिक परीक्षण भी उतने ही आवश्यक हैं। आयुर्वेद की औषधियों, उपचार पद्धतियों और जीवनशैली संबंधी सिद्धांतों पर उच्चस्तरीय अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। औषधियों की गुणवत्ता, शुद्धता, मानकीकरण, मात्रा और संभावित दुष्प्रभावों के संबंध में स्पष्ट वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

आयुर्वेद के क्षेत्र में नए शोध संस्थानों, आधुनिक प्रयोगशालाओं और अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुसंधान सहयोग को बढ़ावा देकर भारत इस क्षेत्र में अपनी भूमिका को और मजबूत कर सकता है। परंपरा और विज्ञान के बीच संवाद स्थापित करना ही भविष्य का रास्ता हो सकता है।

भारत की युवा पीढ़ी को भी आयुर्वेद से जोड़ने की आवश्यकता है। यदि युवा शोधकर्ता आधुनिक तकनीक, डेटा विश्लेषण, जैव-चिकित्सा अनुसंधान और पारंपरिक ज्ञान को एक साथ लेकर काम करें, तो आयुर्वेद के अनेक पहलुओं का वैज्ञानिक मूल्यांकन संभव होगा। इससे आयुर्वेद केवल अतीत की विरासत न रहकर भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।

राष्ट्रीय चिकित्सा नीति में व्यापक भूमिका की मांग


आयुर्वेद दिवस समारोह में उठी मांग का केंद्रीय भाव यही रहा कि आयुर्वेद को भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में अधिक व्यापक और सम्मानजनक स्थान दिया जाए। डॉ. विवेकानंद मिश्र ने आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति घोषित करने की मांग करते हुए कहा कि देश की अपनी चिकित्सा विरासत को उसकी क्षमता और उपयोगिता के अनुरूप महत्व दिया जाना चाहिए।

यह मांग केवल किसी एक चिकित्सा प्रणाली के पक्ष में दूसरी प्रणाली के विरोध के रूप में नहीं देखी जानी चाहिए। भारत की विशाल आबादी और विविध सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए स्वास्थ्य व्यवस्था में विभिन्न प्रमाणित चिकित्सा प्रणालियों की भूमिका और उनके बीच समन्वय पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श आवश्यक है।

स्वास्थ्य अंततः व्यक्ति और समाज दोनों का विषय है। किसी राष्ट्र की प्रगति केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के स्वास्थ्य, जीवन-स्तर और मानसिक संतुलन से भी निर्धारित होती है। इसलिए ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था आवश्यक है जो आधुनिक चिकित्सा की उपलब्धियों के साथ भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के उपयोगी और प्रमाणित ज्ञान का भी समुचित उपयोग कर सके।

आयुर्वेद दिवस बने स्वास्थ्य-संकल्प का अवसर


आयुर्वेद दिवस को केवल एक आयोजन, भाषण या औपचारिक कार्यक्रम तक सीमित रखने की बजाय इसे स्वास्थ्य-संकल्प का अवसर बनाया जाना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में स्वास्थ्य के प्रति कुछ छोटे लेकिन महत्वपूर्ण संकल्प ले सकता है—संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद, शारीरिक सक्रियता, स्वच्छता, तनाव प्रबंधन और आवश्यकता पड़ने पर समय पर चिकित्सकीय परामर्श।

इसी प्रकार समाज के स्तर पर भी कई पहल की जा सकती हैं। विद्यालयों में स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम, ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा शिविर, औषधीय पौधों का संरक्षण, आयुर्वेदिक स्वास्थ्य शिक्षा, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य जागरूकता तथा युवाओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयुर्वेद को जनजीवन से जोड़ने के प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।

आयुर्वेद का वास्तविक पुनर्जागरण तभी संभव है जब इसे केवल गौरवगान का विषय न बनाकर अनुसंधान, शिक्षा, चिकित्सा सेवा और जनजागरूकता से जोड़ा जाए। भारत के पास हजारों वर्षों की चिकित्सा परंपरा है; चुनौती यह है कि उस ज्ञान को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप व्यवस्थित, प्रमाणित और जनोपयोगी बनाया जाए।

आयुर्वेद की सबसे बड़ी शक्ति उसका समग्र दृष्टिकोण है। मनुष्य को केवल रोगों का समूह नहीं, बल्कि शरीर, मन, आहार, व्यवहार और पर्यावरण से जुड़े संपूर्ण अस्तित्व के रूप में देखने की दृष्टि आज भी महत्वपूर्ण है। इसलिए आयुर्वेद के उपयोगी सिद्धांतों को वैज्ञानिक कसौटी पर परखते हुए उन्हें आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है।

समारोह में उपस्थित वक्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी आयुर्वेद के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने तथा इसे समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम में डॉ. पी. मिश्रा, शंभू, गुर्दा, राजीव लाल, हरि नारायण त्रिपाठी, सुरेंद्र दुबे, डॉ. जितेंद्र, अपराजिता मिश्रा, अच्युत अनंत मराठे, अनुपम मिश्रा, डॉ. गीता विश्वकर्मा, डॉ. अकेला, डॉ. विनोद कुमार मिश्रा, डॉ. अजीत कुमार मिश्रा, राखी कुमारी, राजेश त्रिपाठी, शंभू गिरी, जितेंद्र मिश्रा, अशोक दुबे, सत्येंद्र दुबे, पवन मिश्रा, मो. याहिया, पूनम कुमारी, डॉ. प्रमोद कुमार मिश्रा, डॉ. सुरेंद्र प्रसाद, डॉ. अमरेंद्र प्रसाद, डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज, दीपक पाठक, विनोद तिवारी, राजकुमार यादव, अजय मिश्रा, सुनील कुमार, डॉ. दिनेश कुमार सिंह, डॉ. रविंद्र कुमार, मनीष कुमार, डिंपल कुमारी, मेघा मिश्रा, रंजन पांडेय, नीरज वर्मा, दिलीप कुमार, शिवाजी, कुंदन कुमार मिश्रा, नीरज मिश्रा, रणजीत मिश्रा, डॉ. मृदुला मिश्रा, डॉ. ज्ञानेश, सविता कुमारी, पार्वती देवी भारद्वाज, रंजीत पाठक, नुसरत जहां, रेशमा परवीन, हरिद्वार मिश्रा, शारदा साहिब और पुष्पा कुमारी सहित अनेक लोग उपस्थित रहे।

आयुर्वेद दिवस का यह आयोजन इस व्यापक विचार के साथ संपन्न हुआ कि भारत की प्राचीन चिकित्सा विरासत को केवल अतीत की उपलब्धि के रूप में स्मरण करने के बजाय वर्तमान और भविष्य की स्वास्थ्य आवश्यकताओं से जोड़ा जाए। आयुर्वेद की परंपरा को आधुनिक अनुसंधान, वैज्ञानिक परीक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण और जनसेवा से जोड़कर ही उसे व्यापक सामाजिक उपयोगिता प्रदान की जा सकती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपनी चिकित्सा विरासत को लेकर आत्मविश्वास रखे, लेकिन साथ ही वैज्ञानिक दृष्टि और प्रमाण आधारित अनुसंधान को भी सर्वोच्च महत्व दे। आयुर्वेद के गौरव का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, जब ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सुविधा मजबूत हो, जब लोग रोग के बाद उपचार के साथ-साथ रोग-निवारण और स्वास्थ्य-संरक्षण के प्रति जागरूक हों और जब चिकित्सा व्यवस्था का मूल केंद्र मानव जीवन की रक्षा और सेवा बने।आयुर्वेद भारतीय ज्ञान-परंपरा की एक महत्वपूर्ण धरोहर है। उसे सम्मान, अनुसंधान, वैज्ञानिक कसौटी और जनसेवा—इन चारों आधारों पर आगे बढ़ाने का समय आ गया है।
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