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रजनी की निस्तब्ध कोख में, पलता ज्योतिर्मय संसार

रजनी की निस्तब्ध कोख में, पलता ज्योतिर्मय संसार

कुमार महेंद्र
थककर सोई धरा विकल जब,
नभ ने ओढ़ी चादर काली।
तब चुपके से सुलग उठी थी,
पूरब में ऊषा की लाली।
बाहर गहरी नीरवता थी,
भीतर नव सृजन का आधार।
रजनी की निस्तब्ध कोख में, पलता ज्योतिर्मय संसार।।


घोर निराशा के क्षण में भी,
आशा लेती अंगड़ाई।
सूखे तरु के मौन हृदय में,
नव-पल्लव की आहट आई।
अंधियारे की तह में छिपकर,
जाग रहा था नव अंगार।
रजनी की निस्तब्ध कोख में, पलता ज्योतिर्मय संसार।।


जो समझे सब दीप बुझ गए,
उनसे कहता मन मत हार।
गहन तिमिर की छाती चीरकर,
उगता है नव दिन का द्वार।
ओस-कणों के कोमल मोती,
बुनते किरणों का श्रृंगार।
रजनी की निस्तब्ध कोख में, पलता ज्योतिर्मय संसार।।


यह सन्नाटा अंत नहीं है,
यह नव सृजन का क्षण है।
मौन धरा के अंतर से ही,
जन्मेगा उजियारा बनकर।
दुःख की रजनी चाहे लंबी,
भोर करेगी तम पर वार।
रजनी की निस्तब्ध कोख में, पलता ज्योतिर्मय संसार।।


रख मन में अटूट भरोसा,
धीरज मत खोना हे राही।
हर श्यामल शर्वरी लिखती,
भोर सुनहरी आने वाली।
तम के छँटते ही होता,
आशाओं का नव संचार।
रजनी की निस्तब्ध कोख में, पलता ज्योतिर्मय संसार।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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