मैं भारत भूखंड नहीं, राष्ट्र-पुरुष प्रचंड हूँ
कुमार महेंद्रन केवल मिट्टी का विस्तार,
न सीमाओं का घेरा हूँ।
सदियों की तप-साधना का फल,
आदि-अनादि का सवेरा हूँ।
नदियों की धमनियों में बहता,
चिरजीवन का मकरंद हूँ।
मैं भारत भूखंड नहीं, राष्ट्र-पुरुष प्रचंड हूँ।।
मस्तक पर हिमगिरि का मुकुट,
चरण पखारता सागर है।
मेरी धरा के कण-कण में,
संस्कृति का दिव्य उजागर है।
मानवता के पथ पर अडिग खड़ा,
युग-युग से भारत अखंड हूँ।
मैं भारत भूखंड नहीं, राष्ट्र-पुरुष प्रचंड हूँ।।
एक हाथ में वेदों का ज्ञान,
दूजे में सुदर्शन धारण है।
त्याग, तपस्या, करुणा, सेवा,
मेरी आत्मा का आभूषण है।
राम-कृष्ण की मर्यादा हूँ,
बुद्ध-महावीर का मार्तंड हूँ।
मैं भारत भूखंड नहीं, राष्ट्र-पुरुष प्रचंड हूँ।।
शून्य दिया, विज्ञान दिया,
नभ छूने का विस्तार दिया।
मंगल तक बढ़ते चरणों को,
नवयुग का संचार दिया।
ज्ञान-ज्योति से जग आलोकित,
प्रगति-पथ का आनंद हूँ।
मैं भारत भूखंड नहीं, राष्ट्र-पुरुष प्रचंड हूँ।।
तूफानों से टकराकर भी,
जो अडिग खड़ा, वह धीर हूँ।
सनातन ज्ञान के तरकश का,
मैं अमोघ तेजस्वी तीर हूँ।
अंधकार को चीर रहा जो,
प्रखर प्रभात का छंद हूँ।
मैं भारत भूखंड नहीं, राष्ट्र-पुरुष प्रचंड हूँ।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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