शिक्षक दिवस : एक चिंतन
--:भारतका एक ब्राह्मण.
संजय कुमार मिश्र"अणु"
कल शिक्षक दिवस है।सभी जगह कल शिक्षकों के लिए बड़ी बड़ी बातें की जाएगी पर मंच और माइक भर ही।व्यवहार ठीक उलटा ही किया जाएगा।
पहले शिक्षक का सब जगह सम्मान था।इस पद पर पड़े लोग अति सम्मानित जन समझे जाते थे।लेकिन समाज में ज्यों ज्यों राजनैतिक चेतना बढ़ती गई शिक्षकों का वह मन सम्मान गायब होता गया।
शिक्षक को अब सरकार से लेकर समाज तक एक नौकर की नजर की नजर से देखता है।शिक्षक का मन सम्मान अब न तो सरकार कर रही है और न समाज।
समाज जब अशिक्षित था तो एक शिक्षक की गरिमा गोविंद की तरह था।जैसे जैसे समाज शिक्षित होते गया वैसे वैसे शिक्षकों का सम्मान गायब होते गया।इस के लिए हमारा समाज कम से कम दोषी है पर सरकार बहुत ज्यादा दोषी है।
सरकार के जितने भी विभाग है चाहे वो केंद्र की हो या राज्य की सब अपने लोक लुभावने कार्यक्रम चलते रहते रहते है और उस कार्यक्रम के सफल संचालन और क्रियान्वयन के लिए बड़े स्तर पर शिक्षकों को उसमें जोड़ दिया जाता।सरकार शिक्षक को अपना कर्मचारी मानकर अब जगह खुलकर इस्तेमाल करती है।
सरकार के जितने भी कम है आज सब शिक्षकों के जिम्मे है।बात चाहे शराबबंदी की हो या सड़क पर खुले में शौच बंदी की,किसी तरह के सर्वेक्षण की बात हो या वितरण की सब जगह शिक्षकों को जोत दो।परिणाम शत प्रतिशत सही होगा सफल होगा।एकदम सस्ता मजदूर की तरह।
कभी रिपोर्ट के नाम पर,कभी प्रशिक्षण के नाम पर,कभी मकान गिनती के लिए तो कभी जनगणना और मतदान के लिए,कभी तमाम तरह के परीक्षा और उसकी कापी जांच के लिए शिक्षकों को दूसरे जगह भेजकर लगा दिया जाता है।इधर जनता कहती है कि शिक्षक रोज विद्यालय नहीं आते है।आते है तो बच्चों को पढ़ते नहीं नहीं है।शिक्षक आखिर बच्चों को क्या खाक पढ़ाये।शिक्षक बेचारा स्कूल पहुंचता भी नहीं पर है कि सरकार के तमाम विभाग के लोग तमाम तरह के रिपोर्ट एकदम मिनटों में चाहने लगते है और ऊपर से धमकी की तय समय में नहीं होने पर आप पर दंडात्मक कार्रवाई होगी।हे भगवान ये मास्टर है या मशीन?
सरकार के इस तकनीकी फितूर के चक्कर में रोज शिक्षक शिक्षिकाएं असमय में काल कवलित हो रहे है।ई शिक्षा कोश पर हजारी बनानी है वो भी बिल्कुल समय पर और एप है कि खुलने का नाम नहीं लेता है।गलती सिस्टम की और भुगतना पड़ रहा है शिक्षक को।
मानें सुना है कि सभी कर्मचारियों के लिए चुनाव कार्य,आपदा और परीक्षा कार्य में सहयोग करना अनिवार्य है।इस कार्य के लिए आप कुछ भी नानुकुर या बहाना,छुट्टी नहीं ले सकते है। ये एकदम अनिवार्य सेवा है।इसके बाद ही जो आपका कार्य है वो करना है।
मानता हूं ये अनिवार्य है।पर ये भी तो अनिवार्य है जिसके लिए हमारी तैनाती हुई है।संवैधानिक तौर पर चुनाव हर पांच वर्ष पर घोषित है।लेकिन उस चुनाव का दायरा भी बहुत बड़ा है।राष्ट्रपति से लेकर वार्ड तक का तो चुनाव ही हो रहा है।रोज रोज कुछ न कुछ का चुनाव हो रहा है और सरकारी कर्मचारी के नाम पर शिक्षक का शोषण किया जा जा रहा है।
हर जगह कुछ न कुछ आपदा आती रहती है।कभी प्राकृतिक तो कभी मानवकृत तो कभी यांत्रिक।हाल ही में जो कोरोना काल आया था उसमें सारे लोग भयभीत थे।सरकार से लेकर समाज तक त्राहि त्राहि कर रहा था।उस दुखद घड़ी में भी शिक्षकों को कोरोंटाइन केंद्र पर ड्यूटी लगा दिया गया।कभी शौच करते लोगो की निगरानी का पत्र निकलता है तो कभी कुत्ता भागने का।अशिक्षा भागने वाले लोग सरकार के भय का भूत भगाने में लगे हैं।ये कृत्य शिक्षा और शिक्षक के साथ क्रूरतम मजाक नहीं तो और क्या है?
सरकारें पहले भी थी।कार्य पहले भी होता था।शिक्षक पहले भी थे।पर शिक्षकों के साथ जैसा वार्ताव इस सरकार और इसके पूर्व की सरकार में कि है वह कही से भी अच्छा कहने योग्य नहीं है।राजनीति की शिक्षा अनिवार्य है।होनी भी चाहिए पर शिक्षा में राजनीति नहीं होनी चाहिए।लेकिन बड़े अफसोस के साथ मुझे स्वीकारना पड़ रहा है कि आज की शिक्षा कुत्सित राजनीति की भेट चढ़ गई है।सिर्फ आंकड़ों का खेल जारी है।बाकी सब तो सरकारी है।
खैर बात जो हो पर कल शिक्षक दिवस है।मंच पर पहुंचकर माला पहन कर माइक पर खड़े होकर कुछ पल शिक्षकों का गुणगान करिए और फिर जमकर उन्हें परेशान कीजिए।सरकार की यही नीति और नियति है।इससे शिक्षा का सुधार तो नहीं होगा पर शिक्षा जरूर स्वर्ग सिधार जाएगी। इसमें कोई कुछ लेकिन परंतु नहीं है। शिक्षा के लिए समाज और सरकार को चाहिए कि वह राज्य और राष्ट्र के स्वर्णिम भविष्य निर्माण के लिए शिक्षकों का सहयोग करे और उनकी प्रतिभा और लगन का देश हित में प्रयोग करे।शिक्षक भविष्य निर्माता है।राष्ट्र निर्माता है।मानव निर्माता है।इसके साथ निर्मम व्यवहार सर्वथा निदानीय है।
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