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"अंतःसलिला"

"अंतःसलिला"

पंकज शर्मा
किसका है यह नीरव पथ,
किस तट की मूक पुकार?
बहती जाती अंतःसलिला,
लेकर अपना ही भार॥


नील गगन की छाया में,
मन था शिशु-सा निष्पाप।
जग ने पहना दिए मुखौटे,
छूट गया निज आलाप॥


स्मृति—कुहासा बनकर बैठी,
आँखों में संध्या-राग।
बीते तट की रेत समेटे,
क्यों ढोता मन अनुराग॥


जो कल था, वह स्वप्न-शिखर है,
जो कल होगा—मृगमरीचि।
आज स्वयं में दीप जला ले,
यही क्षण है सत्य-समीप॥


जब आकांक्षा थककर सोई,
मौन हुआ अंतर-आकाश।
तब बूँद-बूँद में सुन पड़ता,
अपना ही अनहद प्रकाश॥


अब न तट की खोज शेष है,
न क्षितिजों का मोह।
जिसमें बहकर स्वयं मिला मैं—
वही सलिल, वही मैं, वही प्रवाह॥


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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