"अंतःसलिला"
पंकज शर्माकिसका है यह नीरव पथ,
किस तट की मूक पुकार?
बहती जाती अंतःसलिला,
लेकर अपना ही भार॥
नील गगन की छाया में,
मन था शिशु-सा निष्पाप।
जग ने पहना दिए मुखौटे,
छूट गया निज आलाप॥
स्मृति—कुहासा बनकर बैठी,
आँखों में संध्या-राग।
बीते तट की रेत समेटे,
क्यों ढोता मन अनुराग॥
जो कल था, वह स्वप्न-शिखर है,
जो कल होगा—मृगमरीचि।
आज स्वयं में दीप जला ले,
यही क्षण है सत्य-समीप॥
जब आकांक्षा थककर सोई,
मौन हुआ अंतर-आकाश।
तब बूँद-बूँद में सुन पड़ता,
अपना ही अनहद प्रकाश॥
अब न तट की खोज शेष है,
न क्षितिजों का मोह।
जिसमें बहकर स्वयं मिला मैं—
वही सलिल, वही मैं, वही प्रवाह॥
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8


0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews