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व्यक्ति नहीं, वक्त होता है कमजोर

व्यक्ति नहीं, वक्त होता है कमजोर

कुमार महेंद्र
तूफ़ानों से डरकर जो पथ में,
बैठ गया, वह पथिक नहीं।
पथरीली राहों पर जिसने,
चलना सीखा, वह हारा नहीं।
काँटों को भी फूल समझकर,
करता जा तू श्रम पुरजोर।
व्यक्ति नहीं, वक्त होता है कमजोर।।


विश्वास रख अपनी साँसों पर,
तू अंतरमन से वीर बहुत।
माना राह कठिन है तेरी,
पग-पग पर हैं पीर बहुत।
रजनी चाहे घोर अँधेरी,
सूरज लाएगा नई भोर।
व्यक्ति नहीं, वक्त होता है कमजोर।।


तलवार वही, संधान वही है,
भुजाओं में अब भी बल है।
कालचक्र की गति प्रतिकूल सही,
तेरे भीतर तेज प्रबल है।
धैर्य न खो इस पतझड़ में तू,
फिर महकेगा मधुमास चहुँओर।
व्यक्ति नहीं, वक्त होता है कमजोर।।


पहचान स्वयं की शक्ति को,
तू योद्धा है, सृजनहार।
काली घटा घनी हो चाहे,
छँटता है उसका अँधकार।
कर्मपथ पर अडिग बढ़ता जा,
मिल जाएगा मंज़िल का छोर।
व्यक्ति नहीं, वक्त होता है कमजोर।।


इतिहासों के पृष्ठ साक्षी हैं,
जो झुके नहीं, वे अमर हुए।
जिनके पथ में शूल बिछे थे,
उन्होंने विजय के शिखर छुए।
बादल चाहे जितने घिरें,
सूरज बिखराए अपना जोर।
व्यक्ति नहीं, वक्त होता है कमजोर।।


आज समय प्रतिकूल भले हो,
कल बदलेगा इसका दौर।
सूनी आँखों के आँगन में,
फिर सजेगी सपनों की डोर।
कर्मपथ पर बढ़ता जा तू,
सफलता से होगा सराबोर।
व्यक्ति नहीं, वक्त होता है कमजोर।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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