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चीनी भी लगने लगी अब चीनी

"प्राप्ति और खोना"

पंकज शर्मा
जो दूर है,
वही मूल्यवान क्यों?
पाकर सब शून्य—
यह तृष्णा कैसी है?


दृश्य का सम्मोहन
सत्य ढँक देता है;
रंग उतरते ही
भ्रम कहाँ रहता है?


जो पास खड़ा है,
वही अदृश्य क्यों?
उपस्थिति का मूल्य
अनुपस्थिति बताए क्यों?


जब दृष्टि से ओझल हुआ,
मौन बोलने लगा।
रिक्तता के भीतर
स्मृति क्यों खिली?


वस्तु के खोने पर
इतनी व्यथा क्यों?
क्या कोई अपना
सिर्फ़ पास रहने से अपना है?


शायद कुछ भी मेरा नहीं—
न प्राप्ति, न खोना।
मैं ही अर्थ गढ़ता हूँ,
फिर उसी में बँध जाता हूँ।


क्या जीवन का सत्य
पाने में है—
या यह जान लेने में
कि सब कुछ क्षणिक है?


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️
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