देवघर: जनजातीय संस्कृति का कालजयी संगम
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय उपमहाद्वीप का पूर्वी अंचल, विशेष रूप से वर्तमान झारखंड राज्य का संथाल परगना प्रमंडल, अनादिकाल से ही अध्यात्म, प्रकृति और संस्कृति का एक अनूठा संगम स्थल रहा है। लगभग 14,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक विशाल भू-भाग में विस्तृत यह क्षेत्र केवल एक प्रशासनिक या भौगोलिक इकाई मात्र नहीं है, बल्कि यह सनातन पौराणिक आख्यानों, उत्तर-गुप्तकालीन शिलालेखों, मध्यकालीन जन-आंदोलनों और भारत की प्राचीनतम जनजातीय सभ्यताओं में से एक—संथाल समाज—की जीवन-दृष्टि का जीवंत दस्तावेज है।
उत्तर में पवित्र गंगा नदी के मैदानी इलाकों से लेकर दक्षिण और पूर्व में छोटानागपुर के वनाच्छादित पठारों तक विस्तृत यह क्षेत्र विविध आध्यात्मिक धाराओं—शैव, शाक्त, वैष्णव, सौर, बौद्ध (वज्रयान), और सरना (प्रकृति पूजा)—का महासंगम स्थल रहा है। इस क्षेत्र का हृदयस्थल है 'देवघर', जिसका शाब्दिक अर्थ ही "देवताओं का घर" (देव + घर) है। देवघर केवल तीर्थयात्रियों का गंतव्य नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सभ्यता, वैदिक परंपरा और जनजातीय स्वशासन व्यवस्था के अंतर्संबंधों को प्रदर्शित करने वाला एक अद्भुत ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक मंच है।
देवघर और संथाल परगना की भू-आकृति केवल पर्वतों, नदियों और वनों का समूह नहीं है, बल्कि प्रत्येक प्राकृतिक संरचना के साथ कई पौराणिक कथाएं, वैदिक संदर्भ और प्रागैतिहासिक तथ्य जुड़े हुए हैं।
देवघर की पर्वत श्रृंखलाएं प्राचीन काल से ऋषियों, मुनियों और आक्रांताओं के आकर्षण का केंद्र रही हैं:
देवघर नगर से लगभग 10 किलोमीटर पूर्व में स्थित त्रिकूट पर्वत तीन प्रमुख शिखरों का समूह है, जिन्हें पौराणिक मान्यता के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेव) का प्रतीक है। जनश्रुतियों और क्षेत्रीय आख्यानों के अनुसार, लंकापति रावण का पुष्पक विमान इसी पर्वत मार्ग से होकर गुजरता था।
19वीं और 20वीं सदी में महर्षि द्विपेन्द्रनाथ ठाकुर ने त्रिकूट।पर्वत को अपनी पवित्र तपोभूमि बनाया। यहाँ स्थित त्रिकुटाचल आश्रम आज भी साधकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। तपोवन (तपोवर्धन):प्राकृतिक गुफाओं से आच्छादित यह पहाड़ी स्थल सनातन साधना परंपरा का एक अत्यंत प्राचीन केंद्र रहा है। रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि ने अपनी साधना के कुछ वर्ष यहाँ बिताए थे। आधुनिक काल में स्वामी बालानंद ब्रह्मचारी जी ने इन प्राकृतिक गुफाओं में गहन तपस्या की और सिद्धि प्राप्त की। यहाँ स्थित शिव मंदिर और गुफाएँ आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। नंदन पहाड़: देवघर नगर के समीप स्थित नंदन पहाड़ी भगवान शिव के वाहन नंदी को समर्पित है। वर्तमान में इसे एक सुंदर मंदिर परिसर और बाल उद्यान के रूप में विकसित किया गया है, जो अध्यात्म और पर्यटन का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। पुथरा पहाड़ एवं पथरड्डा पहाड़ी:ये पहाड़ियां धार्मिक दृष्टिकोण के साथ-साथ पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यहाँ से प्राप्त शैलचित्र, प्राचीन मृदभांड और पाषाण कालीन उपकरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस क्षेत्र में प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Era) से ही मानव बसावट विद्यमान थी।
संथाल परगना और देवघर की नदियां केवल जल का स्रोत नहीं हैं; वे इस क्षेत्र की कृषि, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी की जीवनरेखा हैं। अजय नदी मुंगेर (बिहार) की पहाड़ियां यह देवघर और संपूर्ण संथाल परगना की सबसे प्रमुख जलधारा है। यह दक्षिण-पूर्व की ओर बहती हुई पश्चिम बंगाल में गंगा (भागीरथी) से मिलती है। इसका उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है। मयूरक्षी नदी (मोर नदी) देवघर के समीपवर्ती त्रिकूट पहाड़ी क्षेत्र यह नदी क्षेत्र की सिंचाई प्रणाली का मुख्य आधार है। इस पर बना 'मसांजोर बांध' (कनाडा डैम) पूरे प्रमंडल के लिए ऐतिहासिक महत्व रखता है। जयंती, पथरो एवं धारुआ क्षेत्रीय छोटी नदियां एवं पहाड़ियां ये मौसमी नदियां स्थानीय ग्रामीण पारिस्थितिकी तंत्र और कृषि व्यवस्था का मूल आधार हैं। यमुनाजोर देवघर नगर के समीप प्रवाहित धारा पौराणिक आख्यानों में वर्णित यह एक पवित्र धारा है, जिसका संबंध मंदिर प्रांगण के अनुष्ठानों से रहा है।
बाबा वैद्यनाथ मंदिर परिसर और उसके आसपास स्थित जल निकायों का संबंध सीधे रामायण कालीन कथाओं और तंत्र साधना से जोड़ा जाता है: शिवगंगा (मानसरोवर): बाबा वैद्यनाथ मंदिर से लगभग 200 मीटर उत्तर में स्थित यह एक विशाल प्राचीन सरोवर है। जब लंकापति रावण भगवान शिव के 'कामना लिंग' को कैलाश से लंका ले जा रहा था, तब उसे यहाँ तीव्र लघुशंका की अनुभूति हुई। उसने शिवलिंग को एक चरवाहे (बैजू) को सौंप दिया। आचमन हेतु जल न मिलने पर वरुण देव के आह्वान से इस सरोवर का निर्माण हुआ। इसे 'मानसरोवर' का ही एक रूप माना जाता है। हरिला जोरी एवं हंसकुण्ड: देवघर के उत्तर में स्थित हरिला जोरी वह पावन स्थल है जहाँ 'हरि' (भगवान विष्णु) और 'हर' (भगवान शिव) का मिलन हुआ था। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु यहाँ देव रूप धारण कर रावण से शिवलिंग पुन: प्राप्त करने की योजना में सम्मिलित हुए थे।
चंद्रकूप: वैद्यनाथ मंदिर प्रांगण के भीतर स्थित यह एक अति प्राचीन कुआँ है। जनश्रुति के अनुसार, रावण ने विश्व के समस्त पवित्र तीर्थों का जल लाकर इस कुएं में संचित किया था ताकि शिवलिंग का अभिषेक किया जा सके। आज भी मंदिर के गुप्त अनुष्ठानों में इसका विशेष महत्व है। रावण खाड़ सरोवर हैं।
देवघर भारत के उन विरले तीर्थों में से एक है जहाँ एक ही प्रांगण में द्वादश ज्योतिर्लिंग और 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ दोनों विद्यमान हैं। बाबा वैद्यनाथ मंदिर (कामना ज्योतिर्लिंग - :रावणेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसे 'कामना लिंग' कहा जाता है, अर्थात यहाँ श्रद्धा से मांगी गई प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है। मंदिर का मुख्य शिखर 72 फीट ऊँचा है और इसके शीर्ष पर पंचशूल स्थापित है। श्रावण मास में यहाँ विश्व का सबसे लंबा (105 किलोमीटर) कांवर मेला लगता है, जहाँ श्रद्धालु सुल्तानगंज से गंगाजल लाकर बाबा का जलाभिषेक करते हैं।
हृदयपीठ / हार्दपीठ (शक्तिपीठ): - मुख्य ज्योतिर्लिंग मंदिर के ठीक सामने माँ पार्वती का भव्य मंदिर स्थित है। पौराणिक मतानुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर के खंड किए थे, तब यहाँ माँ सती का 'हृदय' गिरा था। इसलिए यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूजनीय है। मुख्य मंदिर और पार्वती मंदिर के शिखरों को लाल धागे से जोड़ना (गठबंधन) यहाँ का एक अनूठा अनुष्ठान है, जो शिव और शक्ति के एकाकार का प्रतीक है।
नौलाखा मंदिर: - स्वामी बालानंद आश्रम के समीप स्थित यह मंदिर स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। 146 फीट ऊँचे इस राधा-कृष्ण मंदिर का निर्माण 20वीं सदी के प्रारंभ में पथरिया घाट की रानी चारुशीला देवी के दान से हुआ था। उस समय इसके निर्माण में ₹9 लाख का व्यय आया था, जिसके कारण लोकवाणी में इसे 'नौलाखा मंदिर' कहा जाने लगा।
सत्संग नगर: - परमप्रेममय श्रीश्री ठाकुर अनुकूलचंद्र जी द्वारा स्थापित यह विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक और सामाजिक केंद्र है। यहाँ संपूर्ण भारत और विदेशों से लाखों अनुयायी आत्म-उन्नति, सह-अस्तित्व और मानवता का संदेश प्राप्त करने आते हैं।
बासुकीनाथ मंदिर: - यद्यपि यह स्थान देवघर जिले की सीमा से सटे दुमका जिले में स्थित है, परंतु धार्मिक परंपरा के अनुसार वैद्यनाथ धाम में जलाभिषेक करने के उपरांत बासुकीनाथ में पूजा-अर्चना किए बिना यह यात्रा अपूर्ण मानी जाती है। लोक परंपरा में वैद्यनाथ को 'दीवानी' और बासुकीनाथ को 'फौजदारी' दरबार माना गया है।
देवघर और संथाल परगना का इतिहास केवल पौराणिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्राचीन शिलालेखों और पुरातात्विक साक्ष्यों से भी प्रमाणित है: मगध साम्राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित होने के कारण इस क्षेत्र पर गुप्त और उत्तर-गुप्त सम्राटों का गहरा प्रभाव रहा। उत्तर-गुप्त सम्राट आदित्यसेन के काल के ऐतिहासिक शिलालेख और स्थापत्य अवशेष देवघर तथा समीपवर्ती मंदार (बांका व संथाल परगना सीमा) क्षेत्र में आज भी देखे जा सकते हैं।
पाल एवं सेन राजवंश (8वीं से 12वीं शताब्दी): का पाल काल में यहाँ शैव मत के साथ-साथ बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा और तंत्र साधना का अभूतपूर्व विकास हुआ। देवघर तंत्र साधना के एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा। यहाँ से प्राप्त बौद्ध मूर्तियाँ और तंत्र-साधना के अवशेष इस बात के प्रमाण हैं। गिद्धौर राजवंश (1596 ई.): का 16वीं शताब्दी में गिद्धौर के राजा पूरनमल ने बाबा वैद्यनाथ मंदिर के मुख्य शिखर और अग्रभाग का भव्य जीर्णोद्धार कराया था। मंदिर के शिलालेख में राजा पूरनमल के इस योगदान का उल्लेख स्पष्ट रूप से मिलता है। नागवंशी एवं चेरो शासक: का झारखंड के स्थानीय नागवंशी और चेरो राजवंशों ने इस पूरे वनांचल भू-भाग को बाह्य आक्रांताओं के आक्रमणों से सुरक्षित रखा और यहाँ की सांस्कृतिक स्वायत्तता को बनाए रखा।
देवघर का नामकरण विभिन्न कालखंडों में इसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताओं के आधार पर परिवर्तित होता रहा है: वैदिक काल में हरीतकीवन एवं केतकीवन (हर्रे के सघन वनों और केतकी पुष्पों की प्रचुरता के कारण) , त्रेतायुग , [रामायण , रावण काल में रावणवन या चिताभूमि (रावण कथा एवं तंत्र-साधना हेतु श्मशान भूमि होने के कारण , लोक परंपरा वैद्यनाथ धाम / बैजू धाम (संथाल/भील चरवाहे 'बैजू' द्वारा शिवलिंग की सेवा का लोक-आख्या , आधुनिक प्रशासनिक काल , देवघर ("देवताओं का निवास स्थान" है।
: संथाल परगना का बहु-सांस्कृतिक एवं बहु-धार्मिक महासंगम - संथाल परगना क्षेत्र किसी एक विशिष्ट धार्मिक धारा या जाति तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह विविध संस्कृतियों का एक समन्वयात्मक केंद्र रहा है:
सौर संस्कृति (सूर्य उपासना): यहाँ सनातन परंपरा का महान पर्व 'छठ पूजा' अत्यंत निष्ठा से मनाया जाता है। वहीं दूसरी ओर, क्षेत्र की प्राचीन पहाड़िया जनजातियों में प्राचीन काल से ही 'बेरू' (सूर्य) की पूजा का विधान रहा है।।शाक्त एवं तंत्र संस्कृति:।कामाख्या और तारापीठ के मध्य स्थित होने तथा स्वयं शक्तिपीठ होने के कारण देवघर तंत्र-साधना का केंद्र रहा है। यहाँ महाविद्याओं की पूजा और सती-उपासना जन-जीवन का अभिन्न अंग है।
शैव एवं वैष्णव ('हरि-हर') परंपरा: शिव और विष्णु की संयुक्त पूजा का अद्भुत समन्वय हरिला जोरी, बैद्यनाथ मंदिर और नौलाखा मंदिर की संस्कृति में स्पष्ट दिखाई देता है। असुर एवं धातु-शिल्प संस्कृति: पौराणिक संदर्भों में यह क्षेत्र रावण, बाणासुर और ताड़का वध से जुड़े दंडकारण्य का भाग माना गया है। इस वनांचल की प्राचीन धातु-शिल्प और लौह-प्रौद्योगिकी का संबंध प्राचीन 'असुर' जनजाति से जोड़ा जाता है। नाग, तरु एवं जल संस्कृति: लोक-जीवन में मनसा देवी (नाग पूजा), कर्म वृक्ष की पूजा (करम परब), तथा नदियों और पोखरों को जीवंत देव मानने की परंपरा सनातन और जनजातीय संस्कृतियों के सहज मिश्रण को दर्शाती है।
संथाल समाज भारत का सबसे बड़ा और प्राचीन समरूप जनजातीय समुदाय है। इनकी अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति, दर्शन और एक सुदृढ़ सामाजिक-गणतांत्रिक संरचना है।।प्रजातीय समूह: नृवैज्ञानिक दृष्टि से संथाल समाज मुख्य रूप से प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉइड प्रजातीय समूह से संबंधित है। इनकी मातृभाषा संथाली है, जो भाषा-परिवार की दृष्टि से ऑस्ट्रो-एशियाटिक (Austro-Asiatic) परिवार की 'मुंडा' उप-शाखा के अंतर्गत आती है।।ओल चिकी लिपि: संथाली भाषा की अपनी स्वतंत्र लिपि 'ओल चिकी' (Ol Chiki) है। इसका आविष्कार महान भाषाविद पंडित रघुनाथ मुर्मू ने वर्ष 1925 में किया था। इसी समृद्ध लिपि और साहित्य के बल पर संथाली भाषा को भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किया गया।
संथालों की वाचिक परंपरा के अनुसार, संपूर्ण मानव जाति की उत्पत्ति 'हंस-हंसली' नामक दो पवित्र पक्षियों के अंडों से हुई है। इन अंडों से प्रथम पुरुष पिलछू हड़ाम तथा प्रथम स्त्री पिलछू बूढ़ी (Pilchu Burhi) का जन्म हुआ।।इस प्रथम दंपति से 7 पुत्र और 7 पुत्रियों का जन्म हुआ, जिनसे संथाल समाज के 12 मुख्य गोत्रों (किली - Kili) का विकास हुआ। संथाल समाज में जन्म आधारित कोई ऊँच-नीच या जातिप्रथा नहीं है; यह एक पूर्णतः समतावादी (Egalitarian) समाज है। संथाल समाज में समगोत्री विवाह (एक ही किली में विवाह) पूर्णतः वर्जित है।
संथाल गोत्रों की पारंपरिक सामाजिक भूमिकाएं:- मुर्मू किल ब गोत्र के लोग पुजारी, गुरु, ठाकुर, बौद्धिक वर्ग है जिनके द्वारा शिक्षा, धर्म और आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया जाता है। सोरेन गोत्र किल के लोग सिपाही, योद्धा, सैन्य बल के द्वारा समाज और क्षेत्रीय सीमाओं की रक्ष , हेम्ब्रम गोत्र किल द्वारा राजा, शासक वर्ग के लोग प्रशासकीय दायित्व और न्याय व्यवस्था , ,मरांडी गोत्र किल के लोग किसान, व्यापारी द्वारा आर्थिक और कृषि प्रबंधन , ,किस्कू पारंपरिक राजा/प्रशासक, टूडू संगीतकार, ढोल वादक, शिल्प कला ,बास्के (Baske) भोजन विश्लेषक, कृषि प्रसंस्करण बेसरा, चौड़े, बेदिया, पौरिया, हाँसदा कृषि, शिकार, सुरक्षा, लोक-कला एवं अन्य सामाजिक दायित्व है।
संथाल जीवन दर्शन का मूल आधार प्रकृति के साथ तादात्म्य है। इनके धर्म को 'सरना धर्म' या प्रकृति पूजा कहा जाता है। इसमें ईश्वर और प्रकृति अलग-अलग नहीं हैं; प्रकृति ही ईश्वर का दृश्य रूप है। प्रमुख देवी-देवता एवं पवित्र स्थल: में मारंग बुरु (Marang Buru): संथाल समाज के सर्वोच्च आराध्य देव हैं। इन्हें 'महान पर्वत देव' तथा पूरी सृष्टि का रक्षक माना जाता है।।जाहेर एरा (Jaher Era): ये संथालों की ग्राम देवी हैं। इनका निवास गाँव के बाहर सखुआ/साल के पवित्र वृक्षों के कुंज में होता है, जिसे 'जाहेर थान' कहा जाता है। जाहेर थान में कोई मूर्ति नहीं होती, केवल पवित्र वृक्षों की पूजा की जाती है। मोड़ेको-तुरुईको: सीमा और लोक-कल्याण की रक्षा करने वाले पंच-देवता।।मांझी हड़ाम: संथालों के पूर्वज देव, जिनकी पूजा गाँव के मुख्य चौपाल यानी 'मांझी थान' पर की जाती है। वे सामाजिक न्याय के प्रतीक हैं।
प्रकृति-केंद्रित प्रमुख पर्व में सोहराय संथालों का सबसे बड़ा त्योहार है, जो फसल कटने की खुशी में (पौष/कार्तिक मास में) मनाया जाता है। इसमें मवेशियों (गाय-बैल) की पूजा और उनके प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। बाहा (Baha): यह वसंतोत्सव है। जब तक जाहेर थान में सखुआ (साल) के नए फूलों और पत्तों को प्रकृति माँ को समर्पित नहीं किया जाता, तब तक कोई भी संथाल नया फूल या फल नहीं तोड़ता। यह पर्यावरण संरक्षण का अनूठा उदाहरण है। करम व करमा - कृषि समृद्धि, भ्रातृ-प्रेम और प्रकृति की उपजाऊ शक्ति की पूजा का पर्व है।
'दामिन-इ-कोह' एवं हूल क्रांति संथाल समुदाय का इतिहास निरंतर संघर्ष, प्रवास और अपनी स्वायत्तता की रक्षा का इतिहास रहा है। संथालों की लोक-परंपरागत स्मृतियों के अनुसार उनका प्रवास मार्ग निम्नलिखित रहा है:
अहिरी पिपरी (हजारीबाग/मध्य भारत) ,चायचंपा (छोटा नागपुर पठार , स्वतंत्र किले एवं स्वर्ण काल) ➔ साओंत/सामंतभूम (बंगाल) ➔ दामिन-इ-कोह (संथाल परगना) , अहिरी पिपरी एवं चायचंपा: संथाल लोकगीतों के अनुसार उनका प्रारंभिक समृद्ध निवास 'अहिरी पिपरी' था। तत्पश्चात वे 'चायचंपा' में बसे, जिसे संथाल इतिहास का 'स्वर्ण युग' माना जाता है जहाँ उनके स्वतंत्र किले थे।
साओंत से 'संथाल' नामकरण: मुगलों और अन्य बाहरी शासकों के दबाव में वे बंगाल के 'सामंतभूम' (साओंत क्षेत्र, वर्तमान बांकुड़ा व मिदनापुर) चले गए। इसी 'साओंत' शब्द के आधार पर इस समुदाय को 'संथाल' कहा जाने लगा।
दामिन-इ-कोह की स्थापना (1832 ई.) 18वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजमहल की पहाड़ियों में निवास करने वाली उग्र 'पहाड़िया जनजाति' को नियंत्रित करने और राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य से संथालों को यहाँ बसने के लिए आमंत्रित किया। वर्ष 1832 में अंग्रेजों ने राजमहल की पहाड़ियों के लगभग 14,000+ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को 'दामिन-इ-कोह' (Damin-i-Koh) घोषित कर दिया। संथालों ने अपने अथक परिश्रम से इस बीहड़ वनांचल को उपजाऊ कृषि भूमि में परिवर्तित कर दिया। शोषण के विरुद्ध महासंग्राम: हूल क्रांति में जब ब्रिटिश शासन, उनके पिट्ठू जमींदारों और बाहरी महाजनों (जिन्हें संथाल 'दिकू' कहते थे) ने संथालों की ज़मीनों पर कब्ज़ा करना और उनका आर्थिक-शारीरिक शोषण करना शुरू किया, तो संथालों ने सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंका।. तिलका मांझी विद्रोह (1784-1785 ई.): बाबा तिलका मांझी (तिलका मुर्मू) भारत के प्रथम जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी माने जाते हैं। उन्होंने 1784 में भागलपुर में अंग्रेज क्लीवलैंड को अपने तीर से मार गिराया। 1785 में उन्हें धोखे से पकड़कर भागलपुर में बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी गई।
. महान संथाल हूल (30 जून 1855): ऐतिहासिक जनसभा: 30 जून 1855 को साहिबगंज जिले के भोगनाडीह गाँव में 50,000 से अधिक संथाल एकत्र हुए। सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव (चारों भाई) तथा उनकी वीरांगना बहनों फूलों और झानो ने इस महाविद्रोह का नेतृत्व किया।
संथाल स्वराज की घोषणा: सिद्धू को 'राजा', कान्हू को 'मंत्री', चांद को 'सेनापति' और भैरव को 'प्रशासक' चुना गया। उन्होंने अंग्रेजों को लगान देने से इनकार कर दिया और अपनी संप्रभुता की घोषणा की। विद्रोह का दमन एवं परिणाम: अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबाने के लिए मार्शल लॉ लागू किया और भयंकर दमनचक्र चलाया जिसमें 20,000 से अधिक संथाल शहीद हुए। यद्यपि सिद्धू-कान्हू शहीद हो गए, परंतु इस विद्रोह ने 1857 की क्रांति की नींव रखी।: इस विद्रोह के दबाव में अंग्रेजों को विवश होकर 'संथाल परगना' नामक अलग जिला बनाना पड़ा और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act) लागू करना पड़ा, जिसने जनजातीय भूमि के हस्तांतरण पर रोक लगाई । संथाल समाज की सबसे बड़ी विशेषता उनकी लोकतांत्रिक, पारदर्शी और विकेंद्रीकृत स्वशासन व्यवस्था है, जिसे 'मांझी-परगना शासन व्यवस्था' कहा जाता है। यह व्यवस्था आज भी संथाल परगना में प्रशासनिक और सामाजिक रूप से प्रासंगिक है।
प्रशासनिक संरचना एवं पदसोपान:[गाँव स्तर: मांझी हड़ाम देश स्तर 5-10 गाँव: देश मांझी परगना स्तर/15-20 गाँव: परगणैत , मांझी हड़ाम : गाँव का प्रमुख प्रशासनिक और न्यायिक प्रमुख। गाँव के सभी सामाजिक और पारिवारिक विवादों का निपटारा मांझी हड़ाम की अध्यक्षता में होता है।।जोग मांझी: मांझी हड़ाम का सहायक, जो युवाओं के नैतिक आचरण और विवाह संबंधी मामलों की देखरेख करता है। प्रामाणिक (उप-मांझी): मांझी हड़ाम की अनुपस्थिति में गाँव का कार्यभार संभालता है।
गोड़ैत: गाँव का संदेशवाहक या सचिव, जो बैठक की सूचना ग्रामीणों तक पहुँचाता है। नायके: गाँव का धार्मिक प्रमुख या पुजारी, जो जाहेर थान में पूजा-अर्चना संपन्न कराता है। कुड़ाम नायके: गाँव की बाहरी सीमाओं पर दुष्ट आत्माओं से रक्षा हेतु पूजा करने वाला उप-पुजारी। परगणैत: 15 से 20 गांवों के समूह (परगना) का प्रमुख। जब कोई मामला गाँव स्तर पर नहीं सुलझता, तो उसे परगणैत के पास भेजा जाता है।।बिटलाहा: संथाल समाज में सामाजिक नियमों (विशेषकर समगोत्री विवाह या गंभीर सामाजिक अपराध) का उल्लंघन करने पर दिया जाने वाला सबसे कठोर दंड 'बिटलाहा' (सामाजिक बहिष्कार) है।
संपूर्ण संथाल परगना का यह भू-भाग केवल एक भौगोलिक क्षेत्र मात्र नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सनातन परंपरा और स्वाभिमानी जनजातीय जीवन-दर्शन का कालजयी संगम है। एक तरफ जहाँ बाबा वैद्यनाथ धाम का ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ आध्यात्मिक चेतना को ऊर्जा प्रदान करते हैं, वहीं दूसरी ओर संथाल समाज का प्रकृति-केंद्रित जीवन, उनकी समतावादी गोत्र व्यवस्था, ऐतिहासिक हूल क्रांति का शौर्य और मांझी-परगना जैसी स्वशासन प्रणाली भारत के वास्तविक गणतांत्रिक मूल्यों को रेखांकित करती है।
यह पावन भूमि हमें सिखाती है कि किस प्रकार अध्यात्म और प्रकृति, आधुनिकता और परंपरा, तथा सनातन धर्म और जनजातीय संस्कृति एक साथ सह-अस्तित्व में रहकर एक समृद्ध और अखंड भारतीय संस्कृति का निर्माण करते हैं।
संदर्भ - , सत्येन्द्र कुमार पाठक (2024), मगध क्षेत्र की विरासत, क्षेत्रीय इतिहास एवं संस्कृति अध्ययन प्रकाशन। एल.एस.एस.ओ मॉली (1910), बिहार एंड उड़ीसा डिस्ट्रिक्ट गज़ेटियर्स: संथाल परगना, पटना। मुर्मू, पंडित रघुनाथ (1925), ओल चिकी एवं संथाली साहित्य का विकास, आदिवासी शोध संस्थान।
रसैल, आर.वी. एवं हीरालाल (1916), द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ द सेंट्रल प्रोविंस ऑफ इंडिया, लंदन।
संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act, 1949), बिहार सरकार प्रशासनिक अभिलेख।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), दक्षिण बिहार एवं संथाल परगना के पुरातात्विक अवशेष रिपोर्ट।
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