तिरंगा
यों ही नहीं ध्वज तिरंगा ,तिरंगा यह तीरंदाज है ।
होता है पक्का निशाना ,
उसपर हमारा नाज है ।।
तिरंगा है वरदान हमारा ,
तिरंगा हमारा शान है ।
तिरंगे हेतु जीवन हमारा ,
तिरंगा यह अरमान है ।।
विश्वविजयी यह तिरंगा ,
जिनमें बसे तीन रंग है ।
सबसे मित्रता भाईचारा ,
न किसी से भी रंज है ।।
तिरंगा भारतीय त्रिनेत्र ,
त्रिनेत्र अभी न खुला है ।
हाथ जोड़ संग चलने में ,
भारत अभी ये भूला है ।।
जो भी दगा करे हमसे ,
उस दिन त्रिनेत्र खुलेगा ।
बरसेगा त्रिनेत्र से अग्नि ,
अग्नि में ही वह झुलेगा ।।
तिरंगा है शंभू का त्रिशूल ,
जहॅं शंभू का स्वयं भू है ।
जिसका मन होता निर्मल ,
बसता नहीं कहीं ये बू है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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