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पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों में बदलाव _एक विमर्श

पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों में बदलाव _एक विमर्श

डाक्टर सुधा सिन्हा

परिवर्तन जीवन का विधान है।
एक परिवर्तन नैसर्गिक है।इसपर हमारा वश नहीं।पर जो परिवर्तन परिस्थिति कृत है उस पर विचार आवश्यक है।कुछ बदलाव हमें विकसित करते हैं तो कुछ हमें हास की ओर ले जाते।सामाजिक और पारिवारिक बदलाव से हमारा विकास हुआ है पर हमारे नैतिक स्तर में ह्रास हुआ है।इस मिली जुली प्रतिक्रिया पर यहां विमर्श आवश्यक है।

पारिवारिक मूल्यों में बदलाव के कारण परिवार के मानसिक और आर्थिक स्तर मे सुधार हुआ है।लडकियां भी लडकों की तरह ऊंची ऊंची डिग्रियां प्राप्त करने लगी हैं। उतर से दझिण ,पूरब से पश्चिम , कामयाबी के झंडे गाड रही हैं।हर छेत्र मे अपना आधिपत्य जमा रही हैं।इससे घर के रहन सहन में काफी बदलाव आ गये हैं।पर बच्चे नेगलेकटेड हो गये हैं।बाजार से मंगवा कर खाने का चलन बढ गया है।दोनो को बराबरी का दर्जा पाने से इगो क्लैश भी काफी बढ गया है।लडाई झगडे काफी होने लगे हैं। तलाक भी बढ गये।संयुक्त यरिवार मे रहने से बडो के प्रति सम्मान, छोटों के प्रति प्रेम, सहनशीलता समर्पण आदि भावनायें जन्म लेने लगती हैं। औद्योगिक क्रान्ति के कारण संयुक्त परिवार बिखर से गये। एकल परिवार का चलन बढ गया।लोग कमाने के लिए बाहर जाने लगे।बुजुर्ग उपेक्षित हो गये।वृद्धाश्रम में जाने लगे।बच्चे अकेले पडने के कारण मोबाइल और मीडिया से चिपक गये।मोबाइल तथा मीडिया के दुष्प्रभाव भी नजर आने लगे।आखों पर प्रभाव पडने लगा।मानसिक बीमारियो से जूझने लगे।
जीवन के विकास के लिए बदलाव जरूरी है पर ऐसा बदलाव न हो कि स्वरूप ही बदल जाए। आज लोग शादी न करेगे,बच्चा न पैदा करेंगे,एक ही बच्चा पैदा करेंगे।शादी न करेंगे ,बच्चा न पैदा करेंगे तो परिवार का अस्तित्व विलीन हो जायेगा । एक बच्चा पैदा करने से फूफा,चाचा,मामा का अस्तित्व खतरे में पड जाएगा।
बदले हुए सामाजिक और पारिवारिक मूल्यो से जीवन का ताना बाना ही उलझ गया है।सबसे अधिक दुष्प्रभाव समलैंगिकता तथा लिव इन रिलेशन से पड रहा है।दो समान लिग के लोगो के साथ विवाह__यह कौनसी विवाह है।विवाह तो हमेशा दो विपरीत लिंग के लोगों के साथ होता है ।स्त्री पुरुष के बीच नैसर्गिक आकर्षण होता है जिसके फलस्वरूप विवाह जैसे रिश्ते की खूबसूरत रचना होती है।
लिव इन रिलेशन ने भी कम गुमराह नहीं किया।कुछ दिन किसी के साथ रहेंगे।अगर नही जांचा तो दूसरे के साथ तीसरे के साथ ।इसका कोई अंत .है कि
नहीं।मनमानी कहीं नहीं चलती। प्रकृति मनमानी करे तो सब उल्टा पुल्टा हो जाए।समलैंगिक विवाह और लिव इन रिलेशन ने जीवन को कुत्सित मोड पर ला कर खडा कर दिया जहा से विनाश और बस विनाश दिखता है ।
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