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भगवद् से भीमराव भले

भगवद् से भीमराव भले

अरुण दिव्यांश
जिस वेद में हो वेदना ,
होता वह तो वेद ना ।
मानवता नाम उसीका ,
आपस में हो भेद ना ।।
कहते हैं कि कैकेयी के कर्कशी रूप के कारण भगवान राम और माता जानकी को वन जाने हेतु मजबूर होना पड़ा और उससे भी अहम् भूमिका तो उस मंथरा दासी की थी , जिसने जिस पर्वत पर एक चूहे की भाॅंति वास बना लिया और धीरे धीरे उसी पर्वत को खोदते खोदते एक रोज पूर्णतः धराशायी ही करके ही दम लिया ।
किंतु मेरी समझ से तो इनमें कोई भी दोषी नहीं है , क्योंकि बिना विधाता के आदेश का चिड़िया भी पर नहीं मार सकती तो माता कैकेयी और दासी मंथरा की क्या औकात है, जो राम और सीता को वन में भेज दे । कहते हैं कि माता कैकेयी के जिह्वा पर माता सरस्वती का वास कराकर तब माता कैकेयी द्वारा महाराज दशरथ को भगवान राम को वन जाने और बेटे भरत को गद्दासीन करने को बाध्य किया गया । यह कहाॅ तक उचित है ! कैकेयी तो भगवान राम की सबसे प्यारी माॅं थी । वह ऐसा करना तो दूर की बात ऐसा कह भी कैसे सकती है ! किंतु निर्दोष होते हुए भी माता कैकेयी को दोषी बनना पड़ा और वर्तमान तथा अगले जीवन में भी उसे इसकी सजा भुगतनी पड़ी । अयोध्या में ही रहकर अपने ही बेटे से चौदह वर्षों तक अलग रहना पड़ा । बल्कि इतना ही नहीं , अगले जन्म में भी बच्चे को जन्म देकर चौदह वर्षों तक बेटे से दूर रहना पड़ा और जिसने विधाता पर भरोसा करके विधाता पर ही सौंप दिया , वह माॅं अगले जन्म में भी उसे जन्म नहीं देते हुए भी उस बच्चे की माॅ बनी रही और सदा ही उसके सान्निध्य में रहती रही ।
गलती तो यहाॅं विधाता का ही था , फिर विधाता को सजा क्यों नहीं ? इससे तो यही साबित होता है कि प्राकृतिक संविधान में विधाता के लिए कोई सजा नहीं ? यह कैसा संविधान है ? ऐसा संविधान कत्तई निर्दोष हो सकता । यह नारदपना को ही विशेष रूप से बढ़ावा देता है ।‌ तभी तो कहा गया है ' समता को कछु दोष न गोसाईं ' । क्यों न बड़ी मछली छोटी मछली को खाए ? क्यों न गरीबों की पत्नी अमीरों की हो भौजाई , क्यों न हो माॅं बहनों का बलात्कार । सबमें तो यही कहा जा सकता है कि यही भाग्य में बदा था , विधाता की ऐसी ही मर्जी थी । देवलोक का भी तो निर्माण हुआ है सृष्टि की कल्याण के लिए । क्या यही कल्याण है ? किसी का बलात्कार हो जाए , किसी की पत्नी छिन जाए , किसी निर्दोष की हत्या हो जाए , पग पग पर किसी को अपमानित किया जाए ? लानत है ऐसे संविधान पर ।
भगवद् से तो भीमराव भले , जिन्होंने संविधान रचयिता होते हुए स्वयं को भी संविधान से बाहर नहीं रखा । यह बात अलग की है कि कुछ ही दिनों बाद अपने कुछ समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म को अपना लिया ।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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