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साँसों की वर्णमाला का, प्रथम और अंतिम अक्षर तुम

साँसों की वर्णमाला का, प्रथम और अंतिम अक्षर तुम

कुमार महेंद्र
मौन अधर की मुखर चेतना,
हृदय-तंत्री की मधुर झंकार।
शून्य डगर में सात्त्विक संबल,
मेरी सृष्टि का अमिट आधार।
साँसों की माला में गूँजती,
तुम्हारे नाम की मधुर सरगम।
साँसों की वर्णमाला का,प्रथम और अंतिम अक्षर तुम।।


नयन मूँदकर जब भी देखा,
उभरा मन में रूप सलोना।
शिशिर-रात्रि की शीतलता में,
जैसे खिलता धूप का सोना।
चाँदनी रात की उजली आभा,
सरिता का कल-कल नाद अनुपम।
साँसों की वर्णमाला का,प्रथम और अंतिम अक्षर तुम।।


मेरी अंतरात्मा का स्पंदन,
अंतरिक्ष का असीम विस्तार।
जिस पर अर्पित जीवन-सर्वस्व,
वही प्रेम का पावन संसार।
सावन की प्रथम मेघ-मल्हार,
आनंद-तरंगिणी अनुपम।
साँसों की वर्णमाला का,प्रथम और अंतिम अक्षर तुम।।


अंतर में वास तुम्हारा है,
निशिदिन, अष्टों प्रहर निरंतर।
मेरी संपूर्ण साधना का,
सत्य-सनातन सुंदर ईश्वर।
तुम्हारी सौम्य अठखेलियों में,
खिलता रहे प्रणय का मधुरम।
साँसों की वर्णमाला का,प्रथम और अंतिम अक्षर तुम।।


मेरी हर धड़कन तुमसे है,
तुमसे जीवन का हर क्रम।
तुम बिन सूना शब्द-संसार,
तुमसे ही कविता का जन्म।
जितना लिखूँ तुम्हारे ऊपर,
उतना ही लगता है कम।
साँसों की वर्णमाला का,प्रथम और अंतिम अक्षर तुम।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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