जी ले जिंदगी
अरुण दिव्यांशजी ले जिंदगी ,
कर ले वंदगी ,
त्याग दरिंदगी ,
त्याग तू निंदगी ।
नयनों से न दूर जा ,
आ दिल के पास आ ,
नयनों के तारे बन ,
मेरे दिल के खास आ ।
बस जा तू वहाॅं ,
बस रहा प्यार जहाॅं ,
दिल से निज पूछ ले ,
हमसे न पूछ कब कहाॅं ।
जन को तू जान ले ,
दुनिया को पहचान ले ,
भला बुरा दुनिया भरा ,
समझ समझ ज्ञान ले ।
प्रण कर तू आज से ,
बॅंध जा तू समाज से ,
एक एक को जोड़ तू ,
मत हत तू रिवाज से ।
स्वच्छ हो स्वछंदगी ,
मत फैला तू गंदगी ,
नर्क हो जाएगा जीवन ,
फिर करोगे क्रन्दगी ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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