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कथा बैकुंठ के द्वारपालो की

कथा बैकुंठ के द्वारपालो की

लेखक आनंद हठिला
क्या आपने कभी सोचा है कि वैकुंठ जैसे दिव्य लोक के सबसे शक्तिशाली द्वारपाल भी श्रापित हो सकते हैं? क्या भगवान श्री हरि के सबसे प्रिय सेवकों को भी ऐसा दंड मिल सकता है कि उन्हें तीन जन्मों तक भयानक राक्षस बनकर पृथ्वी पर जन्म लेना पड़े? और सबसे बड़ा रहस्य यह कि क्या यह वास्तव में श्राप था या स्वयं भगवान द्वारा रची गई एक दिव्य लीला? यह कथा केवल दो द्वारपालों की नहीं, बल्कि भगवान के अवतारों के पीछे छिपे उस रहस्य की है जिसे जानकर हर भक्त आश्चर्यचकित रह जाता है।

भागवत पुराण के अनुसार वैकुंठ वह दिव्य धाम है जहां दुःख, भय, क्रोध और मृत्यु का कोई अस्तित्व नहीं। वहां स्वयं भगवान श्री हरि विष्णु माता लक्ष्मी के साथ शेषनाग की शैया पर विराजमान रहते हैं। उस दिव्य धाम के मुख्य द्वार की रक्षा दो अत्यंत पराक्रमी और तेजस्वी पार्षद करते थे—जय और विजय। दोनों केवल द्वारपाल ही नहीं, बल्कि भगवान के अत्यंत प्रिय सेवक थे। उनके तेज के सामने बड़े-बड़े देवता भी आदर से सिर झुका देते थे।

एक दिन ब्रह्मा जी के मानस पुत्र—सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार—भगवान विष्णु के दर्शन करने वैकुंठ पहुंचे। ये चारों कुमार साधारण बालक नहीं थे। वे अनादि काल से तपस्या और ब्रह्मज्ञान में लीन महान ऋषि थे। यद्यपि उनकी आयु हजारों वर्षों से भी अधिक थी, फिर भी उन्होंने सदैव पांच वर्ष के बालकों जैसा स्वरूप धारण कर रखा था। उनके शरीर पर वस्त्र भी बहुत कम थे, क्योंकि वे संसार के सभी बंधनों से मुक्त थे। उनके मुख पर दिव्य तेज था और मन में केवल भगवान के दर्शन की लालसा।

चारों कुमार बिना किसी रोक-टोक के भगवान के महल की ओर बढ़ने लगे। तभी जय और विजय ने उन्हें देखा। उनके बाल स्वरूप को देखकर दोनों ने समझा कि कुछ साधारण बच्चे खेलते-खेलते यहां तक पहुंच गए हैं। उन्होंने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया और विनम्र किंतु कठोर स्वर में कहा—"रुको बालकों। अभी भगवान विश्राम कर रहे हैं। बिना अनुमति कोई भीतर नहीं जा सकता।"

चारों कुमार कुछ क्षण शांत रहे। फिर उन्होंने गंभीर स्वर में कहा—"भगवान तो अपने प्रत्येक भक्त के लिए सदा उपलब्ध रहते हैं। उनके द्वार पर किसी को रोका नहीं जाता। तुमने हमें हमारे स्वरूप से पहचाना नहीं और अहंकारवश भगवान तक पहुंचने से रोक दिया।"

जय और विजय को अपनी भूल का आभास नहीं हुआ। उन्होंने पुनः वही उत्तर दिया। अब चारों कुमारों का धैर्य टूट गया। उनके मुख पर क्रोध की ज्वाला प्रकट हुई। उन्होंने कहा—"जिस वैकुंठ में अहंकार का प्रवेश नहीं, वहां अहंकारी सेवकों का भी स्थान नहीं हो सकता। तुम दोनों अपने इस अभिमान के कारण इस दिव्य धाम के योग्य नहीं रहे। हम तुम्हें श्राप देते हैं कि तुम वैकुंठ से पृथ्वी पर जाकर असुर योनि में जन्म लोगे।"

उनके शब्द पूरे वैकुंठ में गूंज उठे। श्राप सुनते ही जय और विजय के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें तुरंत अपनी भूल का एहसास हुआ। दोनों ऋषियों के चरणों में गिर पड़े। आंखों से आंसू बहने लगे। वे बोले—"हे महर्षियों! हमसे भूल हो गई। कृपा करके अपना श्राप वापस ले लीजिए। प्रभु से दूर रहने का दुख हम सह नहीं पाएंगे।"

उसी समय भगवान श्री हरि विष्णु स्वयं वहां प्रकट हुए। भगवान को देखते ही चारों कुमारों ने प्रणाम किया। भगवान मुस्कुराए और बोले—"मेरे भक्तों, जो कुछ हुआ वह भी मेरी इच्छा से ही हुआ है। तुमने जो श्राप दिया है वह व्यर्थ नहीं जाएगा।"

फिर भगवान ने प्रेमपूर्वक जय और विजय की ओर देखा और कहा—"अब तुम्हारे सामने दो मार्ग हैं। पहला, तुम सात जन्मों तक पृथ्वी पर मेरे परम भक्त बनकर जन्म लो और फिर वैकुंठ लौट आओ। दूसरा, केवल तीन जन्मों तक मेरे घोर शत्रु बनो। मैं स्वयं प्रत्येक जन्म में अवतार लेकर तुम्हारा उद्धार करूंगा और उसके बाद तुम तुरंत मेरे पास लौट आओगे।"

जय और विजय के लिए यह निर्णय अत्यंत कठिन था। सात जन्मों तक प्रभु से दूर रहना उनके लिए असहनीय था। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—"प्रभु, हम आपके बिना एक क्षण भी नहीं रह सकते। यदि शत्रु बनकर भी आपके दर्शन और आपके हाथों मुक्ति मिले, तो हमें वही स्वीकार है।"

भगवान मुस्कुराए। उन्हें अपने भक्तों का प्रेम ज्ञात था। उन्होंने आशीर्वाद दिया और उसी क्षण दोनों वैकुंठ से पृथ्वी की ओर प्रस्थान कर गए।

सतयुग में जय और विजय ने हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में जन्म लिया। हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को पाताल में ले जाकर समस्त सृष्टि को संकट में डाल दिया। तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर उसका वध किया। हिरण्यकशिपु ने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया और अपने ही पुत्र प्रह्लाद पर अत्याचार किए। तब भगवान नरसिंह रूप में प्रकट हुए और उसका अंत किया।

समय बीता। त्रेता युग आया। वही दोनों भाई रावण और कुंभकर्ण बनकर जन्मे। रावण के अहंकार और अधर्म ने पूरी पृथ्वी को भयभीत कर दिया। तब भगवान श्री राम ने अवतार लेकर रावण और कुंभकर्ण दोनों का वध किया और धर्म की पुनः स्थापना की।

द्वापर युग में जय और विजय ने अंतिम बार शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में जन्म लिया। शिशुपाल जन्म से ही भगवान श्री कृष्ण से द्वेष करता था। उसने राजसभा में भगवान का बार-बार अपमान किया। जब उसके सौ अपराध पूरे हो गए, तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका उद्धार किया। दंतवक्र भी भगवान का विरोधी बना और अंततः श्री कृष्ण के हाथों ही उसे भी मुक्ति प्राप्त हुई।

जैसे ही तीसरा जन्म समाप्त हुआ, जय और विजय अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप में पुनः वैकुंठ लौट आए। भगवान श्री हरि ने दोनों को प्रेम से अपने समीप स्थान दिया। उनके लिए यह तीन जन्म केवल पृथ्वी की यात्रा नहीं थे, बल्कि भगवान के प्रेम की सबसे अद्भुत परीक्षा थे।

इस कथा का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि यह श्राप वास्तव में श्राप नहीं था। यदि जय और विजय असुर न बनते, तो भगवान विष्णु को वराह, नरसिंह, श्री राम और श्री कृष्ण जैसे दिव्य अवतार लेने का अवसर कैसे मिलता? अधर्म का अंत कैसे होता? भक्त प्रह्लाद, विभीषण और अनगिनत भक्तों की महिमा संसार कैसे जानता? इसलिए यह पूरी घटना भगवान की उस दिव्य लीला का भाग थी, जिसमें उनके भक्त भी उनकी योजना के सहभागी बने।

यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान की दृष्टि में कभी-कभी जो दंड दिखाई देता है, वही आगे चलकर सबसे बड़ा कल्याण बन जाता है। ईश्वर की योजना मनुष्य की बुद्धि से कहीं अधिक गहरी होती है। जो घटना हमें विपत्ति लगती है, वही भविष्य में धर्म की विजय और संसार के कल्याण का कारण बन सकती है। इसी कारण सनातन धर्म में जय और विजय की कथा केवल श्राप की कहानी नहीं, बल्कि भगवान और उनके भक्तों के अनंत प्रेम, विश्वास और दिव्य लीला का अमर प्रमाण मानी जाती है।

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